Saturday, July 31, 2010

अंतरा माली की वापसी


अंतरा माली तो याद ही होगी आपको. और अगर भूल गए हों ,तो हम याद दिलाए देते हैं. हम उन्हीं अंतरा माली की बात कर रहे हैं, जो एक जमाने में रामगोपाल वर्मा की सबसे चहेती नायिका हुआ करती थी. अभिनय तो इन्हें आता नहीं, लेकिन अंग प्रदर्शन के मामलें में हौसला इतना कि शर्लीन चैपड़ा और राखी सावंत को भी पीछे छोड़ दे. रामू के साथ अंतरा माली ने मस्त, कंपनी, रोड़, डरना मना है, मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं, नाच जैसी आधा दर्जन से भी ज्यादा नाकाम फिल्मों में काम किया था. ये सब फिल्में टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिरी थी, लेकिन फिर भी वे अपनी खूबसूरती के बूते रामू की चहेती बनी रही. यह अलग बात है कि अंतरा माली के चक्कर में पढ़कर रामू के अच्छे-भले कॅरिअर का भी सत्यानाश हो गया. जहां तक अंतरा की बात है तो वे आखिरी बार 2005 में आई फिल्म मिस्टर या मिस में नजर आई थी. इस पिक्चर को उन्होंने रामू के साथ मिलकर बनाया भी था, लेकिन नतीजा वही रहा ढाक के तीन पात. इस पिक्चर की नाकामी के बाद अंतरा माली ने भी इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया.
लेकिन पांच साल बाद अब अंतरा की बात इसलिए हो रही है, क्योंकि मोहतरमा एक बार फिर फिल्मों में वापसी कर रही है. जी नहीं, वे रामू के साथ पिक्चर नहीं कर रही है-बेचारे रामू में अब इतना साहस भी नहीं बचा है कि वे एक और प्लाप फिल्म सहन कर सके-बल्कि इस बार तो वे अमोल पालेकर के साथ नजर आएंगी. वहीं अमोल पालेकर, जिन्होंने पहेली जैसी आर्ट फिल्म बनाकर शाहरूख खान जैसे सितारे के कॅरिअर का भी बंटाढार कर दिया था. उन्हीं पालेकर के निर्देशन में अंतरा एंड वंस अगेन नामक एक अंग्रेजी फिल्म में नजर आने वाली है. खास बात यह भी है कि इस फिल्म में अंतरा बोध धर्म की अनुयायी की भूमिका में नजर आएंगी, जिसके लिए उन्होंने अपना सिर भी गंजा करवा लिया है. इस बारे में अंतरा कहती है कि कुछ अलग कर दिखाने के जज्बे के साथ वे इस फिल्म से जुड़ी है.
अब रामगोपाल वर्मा जैसे निर्देशक के साथ तो अंतरा का भला हो नहीं पाया, देखते हैं पहले से हीे पिटे-पिटाए अमोल पालेकर उनके कॅरिअर के साथ क्या करते हैं ?

मुंबईयां फिल्में और अंडरवल्र्ड


मुंबईयां फिल्मों का अंडरवल्र्ड से गहरा रिश्ता है. चैकिएं मत, हम उस रिश्ते की बात नहीं कर रहे है, जिसमें अंडरवल्र्ड के पैसे से बॉलीवुड की फिल्में बना करती है. वो तो, महाराष्ट्र पुलिस और कानून-व्यवस्था के ठेकेदारों के लिए जांच का विषय है. यहां बात हो रही है उन मुंबईयां फिल्मों की, जिनमें अंडरवल्र्ड की दुनिया को दिखाया गया. आजादी के बाद के तीन दशक को छोड़ दे, तो अस्सी के दशक से बॉलीवुड की फिल्मों में अंडरवल्र्ड खूब नजर आने लगा था. याद कीजिए फिरोज खान की धर्मात्मा, अमिताभ बच्चन की कालिया, डॉन फिल्में जिनमें अंडरवल्र्ड का सरगना नायक को ही दिखाया गया था. उसी परंपरा को कायम रखते हुए इस शुक्रवार एक और पिक्चर रिलीज हुई है. वंस अपान ए टाइम नामक अजय देवगन-इमरान हाशमी अभिनीत इस फिल्म में सत्तर के दशक के अंडरवल्र्ड को दिखाया गया है ,जब हाजी मस्तान और दाउद इब्राहिम जैसे कुख्यात सरगना दुनिया के सामने आए थे.
इस अवसर पर यह जानना दिलचस्प होगा कि पिछले कुछ दशक, सालों में वे कौन-कौन सी फिल्में रही, जिन्हें अंडरवल्र्ड की कहानी के चलते दर्शकों ने खूब पसंद किया. इस श्रंखला में सबसे पहले याद आती है रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या की. 1998 में आई इस फिल्म के साथ सही मायनों में अंडरवल्र्ड की कहानी को रियलिस्टिक अंदाज में दिखाने की शुरूआत हुई. इससे पहले की अंडरवल्र्ड पर आधारित बॉलीवुड फिल्मों में सरगनाओं की कहानी को हवा-हवाई अंदाज में दिखाया जाता था. लेकिन सत्या में अंडरवल्र्ड का एकदम वास्तविक चित्रण था. अनुराग कश्यम की कलम से निकली इस फिल्म ने अंडरवल्र्ड फिल्मों की नींव रखी. इस पिक्चर ने ही बॉलीवुड को कश्यप जैसा लेखक और मनोज वाजपेयी जैसा अभिनेता दिया. रामू की यह क्लासिकल पिक्चर एक जमाने में मुंबई पर राज करने वाले अंडरवल्र्ड सरगना अरूण गवली और नेता मोहन रावले के बीच की प्रतिद्वंद्वीता पर आधारित थी. इसके बाद रामू ने अंडरवल्र्ड पर आधारित एक और क्लासिक फिल्म बनाई. नाम था इस पिक्वर कंपनी, जो 2002 में रिलीज हुई थी. अंडरवल्र्ड सरगना दाउद इब्राहिम और छोटा राजन की लड़ाई पर आधारित यह फिल्म भी अजय देवगन और विवेक ओबेराय के शानदार अभिनय के चलते बड़ी हिट साबित हुई थी.
महेश मांजरेकर के निर्देशन में बनी फिल्म वास्तव भी श्रेष्ठ अंडरवल्र्ड फिल्मों में शुमार की जाती है. 1999 में रिलीज हुई इस पिक्चर में संजय दत्त ने अंडरवल्र्ड डॉन की भूमिका निभाई थी. इस पिक्चर के बारे में माना जाता है कि यह छोटा राजन की जिंदगी पर बनी थी और इसमें पैसा भी छोटा राजन ने ही लगाया था.
इसके बाद 2007में आई शूटआउट एट लोखंडवाला में भी अंडरवल्र्ड की दहशत को दिखाया गया था. नब्बे के दशक में मुंबई के लोखंडवाला इलाके में हुए इनकाउंटर पर आधारित इस फिल्म में संजय दत्त पुलिस कमिश्नर बने थे, वहीं विवेक ओबेराय ने डॉन का किरदार निभाया था. महेश भट्ट के बैनर तले आई फिल्म गेंगस्टर में अबू सलेम और उसकी प्रेमिका मोनिका बेदी की कहानी कही गई थी. इमरान हाशमी, कंगना राणावत के अभिनय से सजी यह फिल्म भी खूब चर्चित रही थी.
2009 में विशाल भारद्वाज के निर्देशन में आई फिल्म कमीने में भी अंडरवल्र्ड को दिखाया गया था. इसमें शाहिद कपूर डबल भूमिका में थे, जिसमें से एक भूमिका में वे अंडरवल्र्ड के आदमी बने हैं.
साफ है, बॉलीवुड के फिल्मकारों को अंडरवल्र्ड हमेशा से ही लुभाता रहा है. बॉलीवुड की फिल्मों में अंडरवल्र्ड कहां तक बैठा हुआ है, इसकी बात न ही की जाए तो अच्छा है ,लेकिन इतना तो तय है कि दर्शक भी इन फिल्मों को खूब पसंद करते हैं.

प्यार के फेर में बॉलीवुड और क्रिकेट सितारे


बॉलीवुड सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों के बीच जुगलबंदी मुंबईयां फिल्म इंडस्ट्री की सबसे बड़ी खासियत है. बॉलीवुड के सितारों को इन खिलाड़ियों के साथ नजदीकी रिश्ते बनाना भाता है, वहीं क्रिकेट के मैदान में पसीना बहाने के बाद खिलाड़ी भी चकाचैंध की रंगीनियों में खो जाने से परहेज नहीं करते. और जब बात प्रेम-प्रसंगों की हो तो, कहना ही क्या. अतीत में संगीता बिजलानी-अजहर, रीना राय-मोहसिन खान, शर्मिला टेगोर-नवाब पटौदी जैसी कई शख्सियतों के बीच न सिर्फ प्यार परवान चढ़ा, बल्कि यह रिश्ता शादी की दहलीज तक भी पहुंचा.
इन दिनों भी बॉलीवुड और क्रिकेटरों की प्रेम कहानियां खूब सूर्खियां बटोर रही है. इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद तेज गेंदबाज जहीर खान को लेकर हो रही है. चर्चाएं है कि अपने तेज गेदों से विपक्षियों को पटकनी देने वाले जहीर एक बार फिर अपनी पुरानी दोस्त ईशा श्रावणी के साथ नजदीकियां बढ़ाने में जुटे हुए हैं. गौरतलब है कि सुभाष घई जैसे महान निर्देशक की फिल्म किसना से अपने कॅरिअर का आगाज करने वाली ईशा का जहीर के साथ प्यार कुछ अरसा पहले खूब परवान चढ़ा था. फिर बाद में खबरे आई थी कि अपने-अपने कॅरिअर पर ध्यान देने के लिए दोनों ने इस किस्से को खत्म कर दिया है. लेकिन अब दोनों बिछुड़े प्रेमियों के बीच प्यार की लौ फिर जल गई है. आजकल दोनों एक साथ खूब नजर आ रहे हैं. ईशा के करीबी दोस्तों का मानना है कि दोनों इस बार अपने रिश्ते को लेकर पहले से ज्यादा गंभीर है.
उधर, जहीर के खास दोस्त हरभजनसिंह भी अपनी प्रेमिका गीता बसरा के साथ अपने मनमुटाव दूर करने में लगे हुए हैं. द टेªन जैसी फिल्म में इमरान हाशमी के साथ काम कर चुकी गीता बसरा और हरभजन के प्यार के किस्से लंबे अर्से से कायम है. भज्जी की बहन की शादी में भी बसरा मौजूद थी. लेकिन बीच में खबरे आई थी कि दोनों के बीच रिश्ता खत्म हो गया है. लेकिन इन बातों को गलत साबित करने के लिए वे एक बार फिर साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं.
दोनों ही मामलों में प्रेमी एक-दूसरे से दूर जाने के बाद फिर नजदीक आए हैं. इसलिए कहा जा सकता है कि ये टाइमपास नहीं, बल्कि सीरियस प्यार का मामला है.

डिंपी-राहुल का फिल्मी स्टंट



बॉलीवुड का आकर्षण ही ऐसा है कि एक बार जो इसकी गिरप्त में आाया, वो जिंदगीभर इससे पीछा नहीं छुड़ा पाता है. राजनीतिज्ञ प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन से एनडीटीवी इमेजिन के एक रियलिटी शों में शादी रचाने वाली डिंपी पर भी यह बात लागू होती है. शादी के चार महीने बाद ही हाल में डिंपी ने राहुल पर उनके साथ मारपीट का आरोप लगाया है. यह आरोप लगाने के साथ ही वे अपने पति का घर छोड़कर निकली और अगले दिन सुबह ही मीडिया के सामने आकर अपना रोना रो दिया. लेकिन पिक्चर अभी बाकी थी,...कुछ घंटों बाद डिंपी ने मीडिया को बताया कि राहुल ने उनसे और उनके परिवार से माफी मांग ली है और अब वे बिना किसी गिले-शिकवे के उनके पास वापस जा रही है.
बारह घंटे तक चले इस ड्रामें के बाद डिंपी वापस राहुल के पास पहुंच गई. लेकिन ध्यान दीजिए, इस बीच उन्होंने वह हासिल कर लिया, जिसके लिए ये सारा ड्रामा रचा गया था. याद कीजिए डिंपी राहुल की ब्याहता बनने से पहले कई बंगाली फिल्मों में काम करने के साथ ही कुछ सी ग्रेड की फिल्मों में आईटम गर्ल का काम कर चुकी है. यानी कि उन्हें बॉलीवुड का चस्का बहुत पहले से ही लगा हुआ था. यहां डिंपी के अतीत की बात इसलिए की जा रही है, क्योंकि खबर ये है कि वे जल्द ही एक नए रियलिटी शों में नजर आने वाली है. जाहिर है इस रियलिटी शो को हिट कराने के लिए डिंपी को प्रचार की सख्त जरूरत थी. शायद इसीलिए ये सारा ड्रामा रचा गया, ताकि चंद घंटों के भीतर ही मुप्त की पब्लिसिटी हासिलि कर ली जाएं. वैसे बॉलीवुड का चस्का राहुल महाजन को भी लंबे अरसे से हैं. उनके पिता प्रमोद महाजन भाजपा के मजबूत स्तंभ माने जाते थे, लेकिन बेटे को फिल्मी पार्टियों में मजा आता है. पायल रोहतगी, जुल्फी सैयद समेत कई बॉलीवुड सितारे उनके खास दोस्त हैं. लंबे समय से वे एक फिल्म बनाने की भी योजना बना रहे हैं.
तो, अपने इन्हीं मंसूबों को अंजाम देने के लिए शायद यह ड्रामा रचा गया. सोचें, अगर शायद सच में राहुल ने डिंपी की पिटाई की होती, तो क्या मामला इतनी आसानी से सुलझ जाता ?

Friday, July 30, 2010

कॅरिअर को धक्का देती हीरोईने


हीरोइनों को लेकर बॉलीवुड में एक सर्वमान्य तथ्य बना हुआ है ः जब तक जवानी रहती है, उन्हें फिल्मों में काम मिलता है. जवानी गई, तो धीरे-धीरे फिल्में भी उनके हाथ से जाने लगती है. आखिर में थक हारकर वे फिल्मों से विदा हो जाती है. बीते एक दशक में जूही चावला, करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, तब्बु जैसी हीरोईनों ने अपने कॅरिअर के आखिरी दौर में समझदारी दिखाते हुए फिल्मों को अलविदा कहकर दांपत्य जीवन में प्रवेश कर लिया.
लेकिन इसके उलट कुछ ऐसी भी अभिनेत्रियां है जो अपने कॅरिअर का अच्छा दौर गुजर जाने के बाद भी बॉलीवुड में टिकी हुई है और इस उम्मीद में संघर्ष किए जा रही है कि शायद एक बार उनकी तकदीर फिर चमक जाए, शायद एक बार फिर हिट फिल्मों की कतार उनके नाम के आगे लग जाए.
ऐसी अभिनेत्रियों में सबसे पहले प्रिटी जिंटा और रानी मुखर्जी का नाम आता है. कुछ साल पहले तक ये दोनों बॉलीवुड की शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार की जाती थी. खासकर रानी मुखर्जी तो इंडस्ट्री के तमाम नामचीन फिल्मकारों की पहली पसंद बनी हुई थी. 2000 से 2005 तक रानी मुखर्जी ने एक के बाद एक नायक, कभी खुशी कभी गम, साथिया, चलते-चलते, हम-तुम, वीर-जारा, बंटी और बबली और ब्लेक जैसी कामयाब फिल्में देकर बॉलीवुड की महारानी का खिताब भी हासिल कर लिया था. ये फिल्में टिकट खिड़की पर भी हिट थी और इनमें रानी के काम को आलोचकों ने भी खूब सराहा था. यह वह दौर था, जब रानी बॉलीवुड के हर बड़े निर्माता-निर्देशक और सितारों की पहली पसंद हुआ करते थे. शाहरूख, सलमान, सैफ जैसे बड़े सितारे और करण जौहर, आदित्य चैपड़ा जैसे बड़े फिल्मकार रानी को अपनी फिल्मों में लेने के लिए हरदम तैयार रहते थे.
लेकिन 2005 के बाद से ही रानी मुखर्जी के कॅरिअर में उतार आना शुरू हो गया. कभी बॉलीवुड की महारानी कही जाने वाली रानी मुखर्जी ने पिछले पांच साल से एक भी हिट फिल्म नहीं दी है. इस दौरान उनके खाते में मंगल पांडे, कभी अलविदा न कहना, तारारमपम, पहेली,, थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक दिल बोले हडिप्पा, लागा चुनरी में दाग जैसी बड़े बैनर की नाकाम फिल्में जरूर जुड़ी है. बात बिल्कुल साफ है, रानी का जादू अब दर्शकों के दिलो-दिमाग से पुरी तरह उतर चुका है. बावजूद इसके वे अभी भी इस आस में बॉलीवुड में बनी हुई है कि शायद उनकी किस्मत एक बार फिर चमक जाए. हालांकि लाख कोशिशों के बावजूद आदित्य चैपड़ा और करण जौहर जैसे फिल्मकार भी रानी को कामयाबी दिलाने में असफल ही रहे हैं.
ऐसा ही हाल प्रिटी जिंटा का भी है. यह भी एक संयोग है कि प्रिटी का कॅरिअर भी रानी के साथ ही बुलंदी पर पहुंचा और उनके कॅरिअर का पतन भी रानी के साथ ही शुरू हुआ. रितिक रोशन के साथ 2006 में रिलीज हुई फिल्म क्रिश प्रिटी के कॅरिअर की आखिरी हिट थी. पिछले पांच सालों में प्रिटी के नाम पर भी जानेमन, झूम बराबर झूम, हिरोज, मैं और मिसेस खन्ना जैसी नाकाम फिल्में दर्ज हो चुकी है. इस बीच अपने कॅरिअर की नाकामी को भूलाने के लिए प्रिटी एक बिजनेसमेन भी बन गई है. आईपीएल में पंजाब की टीम में उनका भी निवेश है और पिछले दो सालों से वे फिल्मों से ज्यादा क्रिकेट के मैदान पर नजर आती है. बावजूद इसके फिल्मों का मोह उनसे भी नहीं छूट रहा है.
शिल्पा शेट्टी की हालत हालांकि इनसे कुछ जूदा हैं. उनके कॅरिअर में तो खैर अच्छा दौर कभी आया ही नहीं, लेकिन अब वे दर्शकों द्वारा पूरी तरह भूला दी जा चुकी हैं. प्रिटी की तरह ही अब वे भी आईपीएल में खेलने वाली राजस्थान टीम की मालकिन है और उन्होंने शादी भी रचा ली है. लेकिन फिल्मों से मोह उनका भी नहीं गया है. हाल ही में वे दोस्ताना फिल्म में आईटम गीत करती नजर आई. अब सनी देओल के साथ द मेन नामक एक फिल्म भी कर रही है और सुर्खियों में इसी बहाने बनी रहती है कि शायद कॅरिअर के आखिरी दौर में ही कुछ चमत्कार हो जाए.
हालांकि इन अभिनेत्रियों की चमत्कार की उम्मीद दूर-दूर तक पूरी होती दिखाई नहीं दे रही. बॉलीवुड में हर साल नई अभिनेत्रियां दस्तक देती है. आज की तारीख में बॉलीवुड के पास दीपिका पादुकोण, कैटरीना कैफ, प्रियंका चैपड़ा, सोनम कपूर जैसी जवान और खूबसूरत अभिनेत्रियां है. इनके रहते हुए बुढ़ा चुकी प्रिटी, रानी या शिल्पा को भला दर्शक देखने जाए भी तो क्यों जाए? अफसोस कि इन अभिनेत्रियों को यह बात समझ में नहीं आ रही कि इनका दौर अब खत्म हो चुका है.

पायल रोहतगी के पीछे राहुल


मुंबईया हीरोईनों में एक बात आमतौर पर देखने में आती है ः या तो वे पहले से ही शादीशुदा मर्दो की जिंदगी में बवंडर खड़ा कर देती है या फिर उस मर्द के साथ ही दूसरी बीवी के तौर पर अपनी जिंदगी की शुरूआत कर देती है. बीते जमाने की सितारा हिरोईनें श्रीदेवी, संगीता बिजलानी और करिश्मा कपूर ऐसी ही हिरोईनों में शुमार होती है,जिन्होंने तलाकशुदा मर्दो को अपना जीवनसाथी बनाया.
वहीं कुछ हिरोईनें ऐसे होती है, जो शादीशुदा मर्द के साथ जिंदगी भर का रिश्ता तो नहीं जोड़ती,,लेकिन उनकी वजह से उस मर्द की जिंदगी तबाह जरूर हो जाती है. पायल रोहतगी ऐसी ही हिरोईन है, जिनकी वजह से कभी भाजपा के सूत्रधार कहे जाने वाले दिवंगत नेता प्रमोद महाजन के बेटे राहुल की जिंदगी टूटने की कगार पर खड़ी है.
वैसे, बतौर अभिनेत्री तो पायल रोहतगी का कॅरिअर कब का ठंडा पड़ चुका है. अभिनय उन्हें आता नहीं,, बस खूबसूरत अदाएं है उनके पास. सो इसीे खूबसूरती के बूते वे प्लान, रक्त, 36 चाइना टाउन, दिल कबड्डी जैसी कुछ फिल्मों में नजर आई. लेकिन बतौर अभिनेत्री वे कभी भी अपनी पुख्ता पहचान नहीं बना पाई.
फिर भी वे हमेशा सुर्खियों में बनी रहती है ,तो सिर्फ इसलिए क्योंकि राहुल महाजन के साथ उनके करीबी रिश्ते रहे हैं. दो साल पहले जब राहुल ने अपनी पहली पत्नी श्वेता को तलाक दिया था, तो इसके लिए पायल को ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना गया था. कहा जा रहा था कि राहुल पायल से शादी करना चाहते है, इसीलिए उन्होंने श्वेता को तलाक दे दिया है. श्वेता को तलाक देने के बाद दोनों एक-दूसरे के साथ भी ख्ूाब दिखाई दिए. छोटे पर्दे के कामयाब रियलिटी शो बिग बॉस के दूसरे सत्र में वे राहुल महाजन के साथ नजर भी आई. तब भी इन दोनों के प्रेम-प्रसंगों ने खूब सुर्खियां बटोरी थी. लेकिन न जाने क्या हुआ कि राहुल ने पायल से शादी करने के बजाए छोटे पर्दे पर स्वयंबर का नाटक रचाया और डिंपी गांगुली नामक एक प्रतिभागी को डिंपी महाजन बना दिया.
लेकिन इस शादी के चार महीने बाद ही राहुल की जिंदगी में एक बार फिर तलाक की नौबत आ गई है. हाल ही में राहुल ने डिंपी की जोरदार पिटाई की,, जिससे घबराकर डिंपी ने उनका साथ ही छोड़ दिया है. इस बार भी लड़ाई की वजह पायल रोहतगी को ही बताया जा रहा है. खबरे हैं कि राहुल अभी भी पायल को पूरी तरह भूला नहीं पाए है.ं वे देर रात तक पायल को फोन करते हैं या उसे संदेश भेजते रहते हैं.
हालांकि इसमें पायल की गलती ज्यादा नहीं दिखती. प्रमोद महाजन की मौत के बाद से ही राहुल एक बेहद खुदगर्ज, गैरजिम्मेदाराना शख्सियत के तौर पर दुनिया के सामने आए हैं. अब वे हिंदी फिल्मों की एक आइटम गर्ल के चक्कर में पड़कर एक बार फिर अपनी बसी-बसाई ग्रहस्थी को उजाड़ने पर आमादा हैं.

समीक्षा ः वंस अपान ए टाइम इन मुंबई


2002 में आई राम गोपाल वर्मा की फिल्म कंपनी को याद कीजिए, जिसमें अजय देवगन और विवेक ओबेराय गुरू-चेले की भूमिका में नजर आते हैं. अजय देवगन अंडरवल्र्ड सरगना, तो विवेक ओबेराय उसका खास गुर्गा. लेकिन आखिर में दोनों एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू हो जाते हैं. कुछ ऐसी ही कहानी इस शुक्रवार रिलीज हुई वंस अपान ए टाइम की भी है. एक और संयोग यह कि इस फिल्म में अंडरवल्र्ड सरगना की भूमिका अजय देवगन ने ही निभाई है.
लेकिन रूकिए, इसका मतलब यह नहीं कि वंस अपान ए टाइम कंपनी से मिलती जुलती फिल्म है. दोनों फिल्मों की समानता यही खत्म हो जाते हैं और इसके बाद आप पर्दे पर जो फिल्म देखते हैं, वह खालिस ओरिजनल है. कहानी, डॉयलाग और निर्देशन सभी विभागों में. सबसे अहम बात यह कि मिलन लुथरिया की यह फिल्म पक्की पैसा वसूल है.
फिल्म की कहानी सत्तर के दशक में मुंबई में अंडरवल्र्ड में प्रभुत्व की लड़ाई दिखाती है. अजय देवगन अंडरवल्र्ड के सरगना है, तो इमरान हाशमी एक ऐसा गुर्गा जो तेजीे से अंडरवल्र्ड में अपनी जगह बनाता है. कुछ वक्त के साथ के बाद दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं. इसके बाद आख्रि में बाजी उसी के हाथ लगती है, जिसका गुर्दा ज्यादा मजबूत निकलता है.
कंपनी में भी अजय देवगन ने इसी तरह की भूमिका निभाई थी,, लेकिन इस फिल्म में वे अभिनय की एक और रेंज दिखाते हैं. अंडरवल्र्ड विषयों पर भले ही संजय दत्त ज्यादा फिल्में करते हों, लेकिन ऐसी फिल्मों में करिश्माई अभिनय करवाना हो तो बस अजय देवगन को ले लीजिए. यह बंदा अब हर रोल में कहर ढाने लगा है, चाहें वह गोलमाल श्रंखला की कॉमेडी फिल्में हो या प्रकाश झा की फिल्में. जहां तक इमरान हाशमी की बात है, तो यह उनके कॅरिअर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है. हैरानी होती है कि इतने काबिल अभिनेता को भट्ट कैंप के बाहर फिल्में क्यों नहीं मिलती. शायद इस पिक्चर में जानदार अभिनय के बाद इंडस्ट्री के दूसरेे निर्माता-निर्देशकों की भी इमरान के मामलें में आंखें खूले.
पिक्चर में दो हिरोईनें भी है. कंगना राणावत खूबसूरत लगी है और अजय देवगन के साथ उनकी जोड़ी भी खूब जमी है, बावजूद इसके कि दोनों की उम्र में खासा अंतर है. यही बात प्राची देसाइ्र्र पर भी लागू होती है. वे खूबसूरत भी लगती है और अभिनय से आश्चर्य में डाल देती है. वहीं, रणदीप हुड्डा इस फिल्म में चमत्कार कर देते हैं. अजय और इमरान हाशमी के बीच भी उनकी मौजूदगी फिल्म में हर कहीं नजर आती है. यह उनके कॅरिअर की भी सर्वश्रेष्ठ फिल्म है.
बतौर निर्देशक यह मिलन लूथरिया की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है. सत्तर के दशक की दुनिया दिखाने वाली इस पिक्चर में उनके सामने कई चुनौतियां थी, लेकिन वे खरे उतरे हैं.
खास बात ः अंडरवल्र्ड की ठायं-ठायं के बीच इस फिल्म का सुमधुर गीत-संगीत भी इसकी एक बड़ी खासियत है. गाने बीच में ठूंसे हुए भी नहीं लगते.

Thursday, July 29, 2010

कपड़े उतारती हिरोइनें


बॉलीवुड में अश्लील दृश्यों पर कैंची चलाने के लिए सेंसर बोर्ड मौजूद है. परिवार के साथ बैठकर न देखने लायक दृश्यों को सेंसर बोर्ड आमतौर पर फिल्म की रिलीज से पहले ही हटवा देता है. इससे उन बेचारी हिरोईनों के मंसूबों पर पूरी तरह से पानी फिर जाता है ,जो अपने जिस्म की नुमाइश करके टिकट खिड़की पर कामयाबी के ख्वाब पाल लेती है. सो, अब फिल्मी पर्दे पर तो सेंसर बोर्ड की सख्ती के चलते अंग प्रदर्शन किया नहीं जा सकता. तो, फिर ऐसी अभिनेत्रियां बेचारी क्या करें, जिन्हें अभिनय का तो क ख ग भी नहीं आता, लेकिन दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला बला का खूबसूरत जिस्म उनके पास मौजूद है.
खैर, यह चिंता कुछ अरसे पहले तक हुआ करती थी. आजकल इंटरनेट का दौर है, ट्वीटर, फेसबूक, आर्कूट जैसी दर्जनों सोशल-नेटवर्किंग नामकी वेबसाइटें आ गई है. इन सभी वेबसाईटों का भारत में सबसे बड़ा योगदान यही रहा है कि इनके चलते उन बेचारी बेरोजगार हो चुकी हिरोईनों को सुर्खियों में बने रहने का मौका मिल गया, जिनकी जवानी बस यूं ही गुजर रही थी. अब वे फिल्मों में तो नजर नहीं आती,, पर इंटरनेट पर हर जगह नजर आती है. वे इंटरनेट पर मौजूद तो इस बहाने से हैं कि अपने प्रशंसकों के साथ सीधा संपर्क स्थापित करेंगी, लेकिन उनका मकसद एक ही होता है ः अपने जिस्म की नुमाइश करके खुद का प्रचार करना.
इस मामलें में सबसे पहले और सबसे ज्यादा आगे कदम बढ़ाए शर्लीन चैपड़ा ने. शर्लीन को अभिनेत्री इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बतौर नायिका उनके नाम एक भी पिक्चर दर्ज नहीं है. अभिनय उन्हें आता नहीं और वे इसे करने की कोशिश भी नहीं करती. उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनका मादक जिस्म है, सो वे हमेशा इसकी नुमाइश की फिराक में ही लगी रहती है. सो, इन्हीं नेक इरादों के साथ वे भी इंटरनेट पर मौजूद हैं. लंबे समय से अपने प्रशंसकों को अपने हुस्न के जादू में फंसाए हुए हैं इंटरनेट पर शर्लीन. पिछले दिनों तो शर्लीन ने नेट पर इस कदर अपने जिस्म की नुमाइश कर डाली कि ट्वीटर वालों ने भी हाथ खड़े कर दिए. ट्वीटर के कर्ताधर्ताओं ने शर्लीन को संदेश पहुंचा दिया कि मेडम मेहरबानी करके हमारी साइट पर इस तरह की नग्नता न परोसें, अन्यथा इस साइट की सारी सोशल नेटवर्किंग धरी की धरी रह जाएगी.
इसके बाद शर्लीन तो चुपचाप हो गई है, लेकिन अब खबर है कि मल्लिका शेरावत भी ट्वीटर पर अपनी नग्न तस्वीरे अपलोड कर चुकी है. वैसे यहां मामला दूसरा है. दरअसल लंबे अरसे के बाद बतौर अभिनेत्री मल्लिका की कोई फिल्म रिलीज होने जा रही है. बढ़ती उम्र में हिस्स नाम की इस फिल्म से ही आसरा है मल्लिका को चमत्कार का. सो, मोहतरमा भी शर्लीन की तरह ही अचानक दरियादिल हो गई है.
जाहिर है, अब इस दरियादिली पर भी सेंसर लगाने का वक्त आ गया है. बॉलीवुड की तरह ही एक सेंसर बोर्ड इंटरनेट के लिए भी होना चाहिए, जो इस तरह की विषकन्याओं के अनैतिक इरादों को परवान न चढ़ने दे. इसी में भारतीय संस्कृति की भलाई भी है.

बिन कपड़ों की मल्लिका !!!


2003 में ख्वाहिश और फिर 2004 में मर्डर फिल्म के साथ बॉलीवुड की सबसे मादक और सेक्सी अभिनेत्री का ताज हासिल करने वाली मलाइका शेरावत अपने दर्शकों की रातों की नींद एक बार फिर चुराने की पूरी तैयारी कर चुकी हैं. ख्वाहिश में उन्होंने अपने नायक हिमांशु को दरियादिली के साथ दो दर्जन से भी ज्यादा चुंबन दिए थे. वहीं मर्डर में उनके हुस्न का जादू इमरान हाशमी के सिर चढ़कर बोला था, जिसमें उनके लाखों प्रशंसक भी आ गए थे.
अब, 2010 में, जबकि मल्लिका का जादू फीका पड़ने लगा है, यह दिलकश अदाकारा एक बार फिर अपने बोल्ड रूप के साथ हाजिर हैं. एक बार फिर वे अपनी मादक अदाओं से अपने प्रशंसकों को मतवाला बनाने आ रही है. जी हां, बात रही है मल्लिका की नई फिल्म हिस्स की. यह फिल्म अस्सी के दशक की हिट फिल्म नागिन की तरह है. फिल्म में मल्लिका शेरावत ने नागिन की भूमिका निभाई है. मल्लिका नागिन की भूमिका में, सो उत्तेजक दृश्यों की भरमार की उम्मीद तो लगा ही सकते हैं उनके प्रशंसक. मल्लिका भी अपने प्रशंसकों को निराश नहीं करेगी इस फिल्म में, क्योंकि इस पिक्चर में मल्लिका बिना कपड़ों के नजर आने वाली है. जी हां, इस फिल्म में मल्लिका एकदम नग्न दिखाई देंगी. पिक्चर अभी रिलीज नहीं हुई है, लेकिन इसके कुछ दृश्य मल्लिका ने इंटरनेट पर अभी से डाल दिए हैं. अपने ट्वीटर खाते पर मल्लिका ने फिल्म से जुड़े कुछ पोस्टर डाले हैं, जिनमें वे बिना कपड़ों के नजर आ रही है.
सो, बिना कपड़ो वाली मल्लिका की यह फिल्म 15 अगस्त को रिलीज होने जा रही है. तो तैयार हो जाइए आप भी मल्लिका का सबसे उत्तेजक रूप देखने के लिए.

जन्मदिन विशेष ः संजय दत्त


29 जुलाई 1959 को सुनील दत्त और नरगिस जैसे भारतीय सिनेमा के महान कलाकारों के यहां पहली संतान के तौर पर जन्मे संजय दत्त के लिए जिंदगी बेहद आसान हो सकती थी, लेकिन अफसोस कि हुआ इसके ठीक उलट. 1981 में पिता संजय दत्त ने अपने लाडले बेटे को धूमधाम से लांच करने के लिए रॉकी फिल्म बनाई. फिल्म हिट रही और संजय दत्त भी हिट हो गए. जिंदगी सुहानी नजर आ रही थी, कॅरिअर की बुलंदियां भी नजर आ रही थी. लेकिन संजू बाबा की किस्मत में कुछ और ही लगा था. इससे पहले कि संजय का कॅरिअर परवान चढ़ पाता, सुनील दत्त-नरगिस का यह लाडला ड्रग्स के चक्कर में पढ़ गया. मां-बाप के सामने फिर से एक दिक्कत बन गए संजय. लेकिन संजय के पिता सुनील दत्त एक जमीनी योधा थे, आखिरी दम तक लड़ने वाले, आखिरी दम तक किला लड़ाने वाले. सो, उन्होंने अपने लाडले को फिर से संभाला और फिल्मों की ओर लौटा दिया. बाद के सालों में विदेश से ड्रग्स की लत से छुटकारा पाकर वापस लौेटै संजय दत्त ने विधाता, जान की बाजी, नाम जैसी फिल्मों से खूब शोहरत हासिल की. संजय दत्त का नाम बॉलीवुड के सितारा अभिनेताओं में शुमार होने लगा. लेकिन तभी मुंबई में बाबरी विध्वसं धटा और इस बार संजय दत्त कानून के शिकंजे में आ गए. टाडा के तहत उन पर खतरनाक शस्त्र रखने का आरोप लगा, अंडरवल्र्ड से रिश्तों के चलते लंबे समय तक उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भी रहना पड़ा. लेकिन इस बार भी पिता सुनील दत्त ढाल की तरह सामने आए, अपने बेटे को एक बार फिर सभी दिक्कतों से बाहर निकाला. नब्बे के दशक में बतौर अभिनेता संजय दत्त ने साजन, यलगार, खलनायक, गुमराह दुश्मन, वास्तव, खूबसूरत जैसी हिट फिल्में देकर अपनी मौजूदगी बॉलीवुड में बनाए रखी.
बतौर अभिनेता संजय दत्त के कॅरिअर की सबसे बड़ी उपलब्धि उनके द्वारा की गई फिल्में मुन्नाभाई एमबीबीएस और लगे रहे मुन्नाभाई कही जा सकती है. नए दौर के सिनेमा में संजय दत्त अपनी पहचान खोने लगे थे, तभी राजू हिरानी 2003 में मुन्नाभाई जैसी महान फिल्म लेकर आ गए. आतंकवादियों से संबंध होने का आरोप झेल चुके संजू बाबा रातों-रात मुन्नाभाई के तौर पर देश के भीतर लोकप्रिय हो गए. असल में, मुन्नाभाई एमबीबीएस से संजय दत्त के कॅरिअर की नई शुरूआत हुई.
मुन्नाभाई फिल्मों से मिली लोकप्रियता को वे आज भी बनाए हुए हैं. वैसे आजकल उनकी फिल्में इतनी ज्यादा हिट नहीं होती है, फिर भी इंडस्ट्री में उनकी मौजूदगी बरकरार है. हाल ही में लम्हा जैसी फिल्म में वे नजर आए. पचास साल की उम्र में भी बॉलीवुड की एक्शन और कॉमेडी फिल्मों में उनका जलवा बरकरार है और आने वाले सालों में उनके प्रशसंकों को भी उम्मीद है कि कई और मुन्नाभाई फिल्मों में उनका जलवा बरकरार रहेगा.

Wednesday, July 28, 2010

बदली-बदली एकता कपूर


एकता कपूर की बालाजी टेलीफिल्म्स इन दिनों कायाकल्प के दौर से गुजर रही है. कुछ अरसा पहले तक दिमाग की बत्ती गूल कर देने वाले वाहियात सास-बहू के सीरियल और सिनेमाघर बीच में ही छोड़ देने जैसी उबाउ फिल्में बनाने के बाद एकता कपूर की यह कंपनी आजकल सलीके की फिल्में बनाने लगी है. इस साल की शुरूआत में बालाजी टेलीफिल्म्स के बैनर तले एक बेहद ही बोल्ड और वास्तविक सी लगने वाली फिल्म आई थी. इस पिक्चर का नाम लव, सेक्स और धोखा था, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक दीबाकर बनर्जी ने बनाया था. इससे पहले तो एकता कपूर क्या कूल है हम, इस्तांबूल, ईएमआई जैसी बकवास फिल्में बनाती आई थी, लेकिन लव सेक्स और धोखा के साथ उन्होंने अपनी पुरानी सभी गलतियों को सुधार लिया. लव, सेक्स और धोखा को न सिर्फ आलोचकों ने सराहा, बल्कि यह फिल्म टिकट खिड़की पर भी हिट साबित हुई. इसी से उत्साहित होकर एकता अब नई कहानियों पर फिल्में बनाने लगी है. इस शुक्रवार रिलीज होने जा रही वंस अपान ए टाइम इन मुंबई को भी एकता ने ही प्रोड्यूस किया है.
जी हां, बालाजी के बैनर से निकलने जा रही यह एक और हार्डकोर फिल्म है. इसे मिलन लुथरिया ने निर्देशित किया है और फिल्म की कहानी सत्तर के दशक में मुंबई में पैर जमाने वाले अंडरवल्र्ड की कहानी कहती है. उधर, पिछले कुछ समय से छोटे पर्दे पर भी एकता ने घिसे-पीटे सास-बहू सीरियल बनाना बंद कर दिया है. इसकी बजाए अब वे छोटे पर्दे पर भी ताजगी भरे, अलग-अलग विषयों पर सीरियल बनाने लगी है.
बालाजी के प्रशसंकों को भी एकता का यह नया रूप रंग खूब भा रहा है. इसी का नतीजा रहा कि उन्होंने एकता की पिछली फिल्म यानी पिक्चर लव, सेक्स और धोखा को हाथों-हाथ लिया. और अब प्रशंसक वंस अपान ए टाइम इन मुंबई का भी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

फिल्म समीक्षा ः जाने भी दो यारों


बॉलीवुड के इतिहास में जब भी सर्वश्रेष्ठ कॉमेडी फिल्मों का जिक्र होता है, जाने भी दो यारों का नाम सबसे पहले लिया जाता है. 1984 में रिलीज हुई निर्देशक कुंदन शाह की यह फिल्म इस कदर मनोरंजक है कि दर्शक आज भी हंसने-गुदगुदानें पर मजबूर हो जाते हैं. इस पिक्चर में नसीरूद्दीन शाह और विवेक बासवानी ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थी.
पिक्चर की कहानी कुछ यूं है कि दो दोस्त नसीरूद्दीन शाह और विवेक बासवानी शहर के प्रतिष्ठित हाजी अली एरिया में फोटो स्टूडियो इस उम्मीद से खोलते हैं कि शायद उनका धंधा चल जाएं. आगाज खराब होता है, लेकिन जल्द ही उनकों एक अखबार से काम मिल जाता है. इस दौरान उन्हें पता चलता है कि शहर का म्यूनिसिपल कमिश्नर एक कुख्यात बिल्डर से मिला हुआ है और वे सभी मिलकर शहर की जनता की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करते हैं. मध्यांतर तक दोनों को इस मामलें में कई और सुराग मिलते हैं और मिलती है एक लाश, जिसे बिल्डर ने मरवाया है. इस लाश को लेकर वे इंसाफ के दूत बनने निकल पड़ते हैं, लेकिन भ्रष्ट कानून व्यवस्था, पोली अखबार मालकिन और बिल्डरों के चक्कर में पड़कर अपनी जिंदगी के लिए संकट पैदा कर देते हैं. आखिर में उनका भी वहीं हश्र होता है, जो देश में भ्रष्टाचार, सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने वाले आम आदमी का होता है ः उनकी फरियाद सुनने के बजाए उन्हें ही आरोपी करार दिया जाता है.
निर्देशक कुंदन शाह ने इस फिल्म की कहानी बॉलीवुड में कल्लू मामा के नाम से विख्यात सौरभ शुक्ला के साथ मिलकर लिखी थी. पिक्चर को नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा यानी एनएसडी ने प्रोड्यूस किया था. इस पिक्चर की सबसे बड़ी खासियत इसकी कहानी है. कहानी ऐसी उम्दा और दृश्य ऐसे करीने से गढ़े हुए कि आप हंस-हंसकर लोटपोट हो जाएं. शुरू से आखिर तक कहानी धाराप्रवाह चलती है और दर्शक पूरी पिक्चर में हंसता रहता है.
एक और खास बात, यह पिक्चर कॉमेडी होने के बावजूद संदेशपरक भी है. आजकल की दे दना दन, वेलकम, हाउसफुल जैसी दिमाग से पैदल कॉमेडी नहीं है, ये फिल्म बल्कि समाज की व्यवस्था पर सवाल उठाती है यह पिक्चर. यह फिल्म सरकारी तंत्र, बिल्डरों, अखबार जगत के गठजोड़ पर निर्ममता से प्रहार करती है और कई सवाल भी खड़े करती है. यह फिल्म बताती है कि भ्रष्टाचार में आकंठ तक डूबे इस समाज में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना कितना महंगा पड़ सकता है.
कुंदन शाह की यह फिल्म आॅलटाइम क्लासिक कॉमेडी तो है ही, एक सार्थक संदेश भी देती है और यही इसे भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ कॉमेडी फिल्मों में शीर्ष पर पहुंचाती है.

यादें ः नहीं रहे बासवानी


जाने भी दो यारों जैसी आॅलटाइम क्लासिक फिल्म में नसीरूद्दीन के साथ मुख्य भूमिका निभाने वाले रवि बासवानी
का कल रात मुंबई में हार्ट अटैक से निधन हो गया. चैसठ वर्षीय बासवानी मुख्य रूप से थियेटर से जुड़े कलाकार थे. 1981 में संई परांजपे की फिल्म चश्मे बद्दुर के साथ उन्होंने अपने कॅरिअर की शुरूआत की थी. इस फिल्म में फारूख शेख के दोस्त की भूमिका में नजर आए वासवानी ने अपनी बेहतरीन कॉमेडी से दर्शकों को खूब गुदगुदाया था. लेकिन 1984 में आई जाने भी यारों वासवानी के कॅरिअर की सबसे बेहतरीन फिल्म साबित हुई. समाज की व्यवस्था पर कटाक्ष करती इस फिल्म में वासवानी नसीरूद्दीन शाह के साथ फोटोग्राफर की भूमिका निभाई थी. तीन दशक बाद भी इस फिल्म को एक कल्ट फिल्म के तौर पर याद किया जाता है और इसकी कॉमेडी आज भी दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर देती है.
हाल के सालों में वासवानी कभी हां, कभी ना, प्यार तूने क्या किया, बंटी और बबली जैसी फिल्मों में नजर आए थे. फिल्म इंडस्ट्री में अनुपम खेर और नसीरूद्दीन शाह उनके सबसे करीबी दोस्त थे.

बॉक्स आफिस ः अक्षय के लिए खट्टी रही खट्टा-मीठा



पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म खट्टा-मीठा को आलोचकों ने तो पहले दिन ही खारिज कर दिया था, अब टिकट खिड़की के आंकड़ों ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है कि अक्षय कुमार के खातें में एक और नाकाम पिक्चर दर्ज हो गई है. खट्टा-मीठा ने अपने पहले तीन दिनों में देशभर में 23 करोड़ रूपए की कमाई की. इसे दिन के हिसाब से देखा जाए तो फिल्म ने शुक्रवार को 7 करोड़, शनिवार को 7.5 करोड़ और रविवार को 8.5 करोड़ रूपए की कमाई की.
पिछले दो सालों में यह अक्षय कुमार की किसी भी फिल्म की पहले तीन दिन की सबसे कम कमाई है. यहां तक कि इस साल के शुरू में अक्षय की ब्ल्यू जैसी बकवास फिल्म ने भी पहले तीन दिनों में 28 करोड़ रूपए की कमाई की थी. खास बात यह है कि पिछले शुक्रवार खट्टा-मीठा के साथ दूसरी कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई थी. बावजूद इसके अक्षय की यह फिल्म उम्मीदों के मुताबिक कारोबार नहीं कर पाई.
टिकट खिड़की पर घटिया प्रदर्शन के बाद यह तय माना जा रहा है कि फिल्म के निर्माताओं को नुकसान उठाना पड़ेगा. हालांकि प्रियदर्शन अपनी फिल्मों को सस्ते बजट में बनाने के लिए जाने जाते हैं, फिर भी यह फिल्म निर्माताओं के लिए घाटे का सौदा साबित होगी.
यहां एक और खास बात ः इस फिल्म के निर्माताओं में अक्षय कुमार का नाम भी शामिल है. जी हां, अक्षय इस पिक्चर के साथ पहली बार निर्माता बन गए हैं. अपने होम प्रोडक्शन हरी ओम इंटरटेनमेंट के बैनर तले इस पिक्चर को बनाया था. अक्षय और फिल्म के दूसरे निर्माताओं के बीच यह तय हुआ था कि वे अपनी फीस नहीं लेंगे, लेकिन फिल्म की कमाई में बराबरी का हिस्सा लेंगे.
लेकिन फिल्म टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिर गई है, तो अक्षय को भी बतौर निर्माता अपनी पहली ही फिल्म में नुकसान झेलना पड़ेगा. अक्षय के लिए बुरी खबर यह है कि सोमवार से ही फिल्म के कारोबार में 40-50 फीसदी से भी ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है. इसका मतलब यह कि पिक्चर पूरा एक सप्ताह भी नहीं टिक पाई. कूल मिलाकर अक्षय और प्रियदर्शन दोनों के लिए खट्टा-मीठा खट्टा अनुभव साबित हुई है.

Tuesday, July 27, 2010

वंस अपान ए टाइम इन मुंबई


इस शुक्रवार रिलीज होने जा रही फिल्म वंस अपान ए टाइम इन मुंबई कई मायनों में एक दिलचस्प और उत्सुकता जगाने वाली पिक्चर है. पहली बात तो यह कि इस फिल्म का निर्देशन मिलन लूथरिया ने किया है, जिन्होंने इससे पहले भारतीय सिनेमा प्रेमियों को कच्चे धागे, टेक्सी नंबर नौ दो ग्यारह और दीवार जैसी फिल्में दे चुके हैं. दूसरी बात यह कि इस पिक्चर के साथ इमरान हाशमी भी अपनी किसर बाय की छवि से मुक्त होने जा रहे हैं, जिन्होंने इस फिल्म में एक उभरते हुए गैंगस्टर की भूमिका निभाई है.
फिर भी,, फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सत्तर के दशक के मुंबई पर आधारित है. पिक्चर में यह दिखाया गया है कि किस तरह अंडरवल्र्ड ने सत्तर के दशक में पहली बार मुंबई में अपनी पैठ जमाई. माना जा रहा है कि यह पिक्चर सत्तर के दशक के अंडरवल्र्ड सरगना हाजी मस्तान की जिंदगी पर आधारित है, जिसे बाद के सालों में दाउद इब्राहिम ने चुनौती दी थी. इस पिक्चर में बताया गया है कि किस तरह स्मगलिंग जैसे छोटे काम से शुरूआत करके अपराध सरगनाओं ने धीरे-धीरे मुंबई में अपनी जड़े फैलाई और बाद के सालों में पूरे मुंबई पर राज करने लग गए. इसमें बताया गया है कि किस तरह बाद के सालों में गैंगस्टर बॉलीवुड के भी भाग्य विधाता बन बैठे ? इसमें अजय देवगन के किरदार को हाजी मस्तान से प्रेरित बताया जा रहा है, वहीं इमरान हाशमी के किरदार को दाउद इब्राहिम से, जो अजय देवगन की सल्तनत के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरता है.
मिलन लुथरिया की यह फिल्म दो गैंगस्टरों के बीच वर्चस्व की लड़ाई की कहानी कहती है. इससे पहले भी मुंबई के अंडरवल्र्ड पर रामगोपाल वर्मा कंपनी जैसी बेहतरीन फिल्म बना चुके है. संयोग की बात यह है कि इसमें भी अजय देवगन ने अंडरवल्र्ड सरगना की भूमिका निभाई थी. लेकिन मिलन लूथरिया की फिल्म में उनके रोल को कंपनी से पूरी तरह से अलग माना जा रहा है.
वंस अपान ए टाइम इन मुंबई 30 जुलाई को रिलीज होने जा रही है. पिक्चर में कंगना राणावत और प्राची देसाई भी प्रमुख भूमिकाओं में है ,लेकिन सभी की नजरे अजय देवगन और इमरान हाशमी पर ही टिकी हुई है.

पाकिस्तानी कलाकारों से परहेज क्यों ?


देश की राजनीतिक पार्टियां आमतौर पर सुर्खियों में बने रहने के लिए निम्नतम स्तर के हथकंडे अपनाने से भी परहेज नहीं करती. ऐसी ही एक राजनीतिक पार्टी ने हाल ही में बॉलीवुड को यह फरमान सुना दिया है कि साहब पाकिस्तानी कलाकारों को अपनी फिल्मों, छोटे परदे के कार्यक्रमों में काम देने से परहेज करो, वरना अंजाम बुरा होगा. ऐसी पार्टियों और नेताओं का मानना है कि जब पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते अच्छे नहीं है, तो फिर उसके कलाकारों को भारतीय मनोरंजन जगत में भला क्यों काम करने दिया जाए ?
बात पते की है, लेकिन लगती गलत है. पहली बात तो यह कि कला को किसी सीमा या देश के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता. अगर पाकिस्तानी कलाकारों में हूनर है, तो उन्हें बॉलीवुड या हॉलीवुड या फिर कॉलीवुड कहीं भी काम दिया जाए, तो इसमें कोई भी बुराई नहीं है. माना कि पाकिस्तान में भारतीय गायको, कलाकारो और शास्त्राीय संगीतज्ञों पर पाबंदी लगी हुई है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है कि पाकिस्तान जैसा ही ओछापन हम भी दिखाएं.
दरअसल यह सारा मामला इन दिनों इसलिए तूल पकड़ रहा है क्योंकि हाल ही में एक पाकिस्तानी गायक अली जफर की हिंदी फिल्म रिलीज हुई है तेरे बिन लादेन. फिल्म बॉलीवुड की है, लेकिन इसमें मुख्य भूमिका अली जफर ने निभाई है. उधर, आजकल छोटे पर्दे के टीवी चैनलों पर भी जो रियलिटी शो, संगीत आधारित कार्यक्रमों की बाढ़ आई है, उनमें भी पाकिस्तानी कलाकार खूब दिखाई दे रहे हैं और ख्ूाब तारीफें भी बटोर रहे हैं. स्टार प्लस पर आजकल एक ऐसा ही टेलेंट शो दिखाया जा रहा है छोटे उस्ताद नाम से, जिसमें पाकिस्तानी बच्चें संगीत के मामलें में भारतीय प्रतिभाओं को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. भारत की ओर से इसमें सोनू निगम प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.
विवाद इन्हीं पाकिस्तानी प्रतिभाओं की भारतीय मनोरंजन जगत में शिरकत को लेकर तूल पकड़ रहा है. मांग की जा रही है कि इन प्रतिभाओं को भारतीय मनोरंजन जगत में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका न दिया जाएं.
हालांकि इस तरह की मांग करने वालों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं होता कि यह सही है या गलत. वे इस बात की भी कोई गारंटी नहीं दे सकते कि अगर वे पाकिस्तानी कलाकारों की प्रतिभाओं को रोक देंगे, तो उन्हें कोई दूसरा मंच नहीं मिलेगा.
जबकि असलियत यह है कि उन्हें बराबर मंच मिलेगा. अगर किसी के पास कला है, तो वह उसे निखारकर ही रहता है, फिर चाहे कितनी भी उलझने क्यों न आए ? दूसरी ओर पाकिस्तानी कलाकारों को भारत आने से रोककर हम अपनी ओछी मानसिकता का परिचय ही देंगे.

भूला दी गई नायिकाएं


बॉलीवुड में हर कदम सोच-समझकर बढ़ाना होता है. जरा कदम डगमगाया नहीं कि आप खेल से बाहर...अभिनेताओं, निर्देशकों, निर्माताओं सभी के साथ यही होता है. बॉलीवुड की चांदनी में चार चांद लगाने वाली अभिनेत्रियों पर भी यह बात लागू होती है. जब इंडस्ट्री पर पकड़ जरा कमजोर हुई, तो तमाम लटकों-झटकों, तमाम मादक अदाओं के बावजूद ये अभिनेत्रियां घर बैठने पर मजबूर हो जाती है. बीते कुछ सालों में बॉलीवुड पर नजर दौड़ाए तो ऐसी दर्जनों नायिकाएं नजर आती है, जिन्होंने अपनी पहली फिल्म या शुरूआती कुछ फिल्मों में खूब कामयाबी हासिल की,, लेकिन बाद में ढेर सारी फिल्मों की नाकामी के बाद अंधियारें में खो गई.
आयशा जुल्का ऐसी ही एक अभिनेत्री थी. नब्बे के दशक में खिलाड़ी,, जो जीता वही सिकंदर, बलमा, रंग और वक्त हमारा है जैसी फिल्मों में काम करने वाली आयशा के कॅरिअर को लेकर उनके प्रशंसकों को खूब उम्मीद थी. खिलाड़ी और वक्त हमारा है में उन्होंने अक्षय कुमार और जो जीता वही सिकंदर में आमीर खान जैसे सितारे के साथ काम किया था. लेकिन इसके बाद की फिल्में नहीं चली उनकी. गलत फिल्मों का चुनाव, गलत निर्देशकों के साथ काम करने का खामियाजा यह हुआ कि वक्त से पहले ही उनका कॅरिअर खत्म हो गया. पिछले कुछ सालों से वे रन, सोचा न था, डबल क्रॉस, उमराव जान जैसी फिल्मों में चरित्र भूमिकाएं करती नजर आई है. हालांकि अभी भी वे मात्र 34 साल की है, लेकिन उनका कॅरिअर एक दशक पहले ही खत्म हो गया था. जाहिर है, जिस तेजी से वे कॅरिअर की बुलंदी पर पहुंची थी,, उसी तेजी से नीचे भी आ गई.
आयशा जुल्का जैसा ही हश्र नगमा का भी हुआ. 1990 में बागी फिल्म में उन्होंने सलमान खान जैसे बड़े सितारे के साथ अपने कॅरिअर की शुरूआत की थी. फिल्म हिट रही और सलमान खान का कॅरिअर भी चल पड़ा. लेकिन नगमा का कॅरिअर पहली फिल्म के साथ ही रूक गया. इसके बाद उन्होंने यलगार, सुहाग जैसी फिल्मों में संजय दत्त और अक्षय कुमार जैसे बड़े सितारों के साथ भी काम किया, लेकिन कामयाबी उनसे दूर ही रही. हाल ही में वे गंगा नामक एक भोजपुरी फिल्म में अमिताभ बच्चन और रवि किशन के साथ दिखाई दी,, लेकिन उनका कॅरिअर न जाने कब का खत्म हो चुका है. आयशा जुल्का की तरह ही वे भी अभी मात्र 35 साल की है, लेकिन उनका स्वर्णिम दौर एक दशक पहले ही गुजर चुका है.
हालिया कुछ सालों पर नजर दौड़ाएं, तो भूमिका चावला की भी यही दुर्गति हुई. 2003 में आई फिल्म तेरे नाम में वे सलमान खान के साथ नजर आई थी. यह बॉलीवुड में उनकी पहली पिक्चर थी. तेरे नाम 2003 की सबसे बड़ी हिट साबित हुई. सलमान खान के डूबते कॅरिअर को इस फिल्म ने फिर से किनारे लगा दिया. लेकिन भूमिका के लिए यह पहली और आखिरी हिट फिल्म साबित हुई. इसके बाद उन्होंने दिल ने जिसे अपना कहा, फेमेलीे और गांधी माय फादर जैसी फिल्मों में काम किया, लेकिन पहली फिल्म की कामयाबी को वे दोहरा नहीं पाई. आजकल वे दक्षिण की फिल्मों में ही काम करके गुजर-बसर कर रही है.
ऐसा ही हश्र ग्रेसी सिंह का भी हुआ. उनके नाम पर तो मुन्नाभाई एमबीबीएस और लगान जैसी भारतीय सिनेमा की दो सबसे हिट और महान फिल्में दर्ज है. इसके बाद उन्होंने गंगाजल जैसी फिल्म में भी काम किया. लेकिन इन सभी फिल्मों की कामयाबी का फायदा सिर्फ इनके नायकों को हुआ और ग्रेसी सिंह का कॅरिअर गुमनामी के अंधेरों में खो गया. दो साल पहले वे देशद्रोही जैसी सी-ग्रेड फिल्म में नजर आई, जिसके बाद उनके कॅरिअर पर भी पूर्णविराम लग गया.
बत सीधी सी है, इंडस्ट्री में टिके रहने के लिए कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं. आपकी किस्मत भी होनी चाहिए उस तरह की और जज्बा की. जिनके पास यह दोनों नहीं होता, वे कुछेक वक्त की चकाचैंध के बाद गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं. अपनी पहली ही फिल्म से सितारों की तरह चमकने वाली इन अभिनेत्रियों के साथ भी यही हुआ.

संगीता बिजलानी का सलमान कनेक्शन !!!


संगीता बिजलानी को तो जानते ही होंगे आप...! 1980 में मिस इंडिया रही खूबसूरत बिजलानी अस्सी के दशक में राजीव राय की त्रिदेव और महेश भट्ट की जुर्म जैसी फिल्मों में बतौर नायिका काम कर चुकी है. दूरदर्शन पर लंबे समय तक उन्होंने रंगोली कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया है. इससे भी बड़ी पहचान बिजलानी की यह है कि वे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन की पत्नी हैं.
लेकिन यहां बात बिजलानी की फिल्मों और उनके पतिदेव को लेकर नहीं हो रही है, बल्कि बात बॉलीवुड के सबसे चर्चित कुंवारे के साथ उनके संबंधों को लेकर हो रही है. अब तो आप समझ ही गए होंगे कि बात खान सितारों में सबसे ज्यादा चर्चित और विवादास्पद सलमान खान की हो रही है. जी हां, सलमान के साथ संगीता बिजलानी का पुराना रिश्ता है. यह रिश्ता नब्बे के दशक में शुरू हुआ था, जब बिजलानी और सल्लू मियां के प्रेम संबंध पूरे बॉलीवुड में सुर्खियों में रहा करते थे. लेकिन कुछ सालों के प्यारभरे एपिसोड के बाद इस कहानी में ट्वीस्ट आ गया, जब सल्लू मियां का दिल बॉलीवुड की एक और दिलकश अदाकारा सोमी अली पर आ गया. नतीजा यह रहा कि टूटे दिल के साथ बिजलानी सल्लू मियां की दुनिया से दूर चली गई और मैच-फिक्सिंग प्रकरण में फंसे अजहरूद्दीन से निकाह रचा लिया.
लेकिन डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त के बाद अब ये बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका वापस नजदीक आ गए हैं. मामला ऐसा है कि बिजलानी के पति महोदय अजहर इन दिनों अपने से आधी उम्र की बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गट्टा के प्यार में पढ़ गए हैं. बिजलानी ने अजहर का दामन ऐसे वक्त थामा था, जब मैच फिक्सिंग के दलदल में फंसे इस भूतपूर्व भारतीय कप्तान से सारी दुनिया ने नाता तोड़ लिया था. लेकिन अब अजहर अपनी वफादार बीवी के साथ ही दगाबाजी पर उतर आए हैं. सो, ऐसे मुश्किल वक्त में बिजलानी से फिर से सल्लू मियां को याद किया है. वैसे भी अपनी दरियादिली के लिए मशहूर सलमान अपनी भूतपूर्व प्रेमिकाओं को लेकर तो कुछ ज्यादा ही उदार रहते हैं. बाद में उनकी जिंदगी से सोमी अली भी चली गई, लेकिन अली और बिजलानी दोनों के साथ उनके मधुर संबंध अब भी कायम हैं. दोनों ही सल्लू मियां के घर भी आती-जाती हैं और उनके परिवार के साथ भी दोनों की नजदीकियां है.
सो, सलमान भी बिना देर किए बिजलानी को सहारा देने के लिए आगे आ गए हैं. हालांकि सलमान की इस दरियादिली पर उनकी वर्तमान प्रेमिका कैटरीना कैफ की क्या प्रतिक्रिया रहेगी, यह पता लगना अभी बाकी है. लेकिन इससे बेफिकर सलमान तो लग गए हैं अपनी पूर्व प्रेमिका के घावों पर मरहम लगाने में....

Monday, July 26, 2010

फिल्मों में बेचारे, विज्ञापनों में सितारे


बॉलीवुड में हर चीज, हर खूबी,, हर बात को बेच दिया जाता है. यहां तक कि खुद से जुड़े विवादों को भी पूरी बेशर्मी के साथ बेच दिया जाता है, ताकि थोड़ा सा प्रचार मिल जाए, कुछ अखबारों-चैनलों की सूर्खियां बन जाएं उनसे जुड़ा विवाद. ऐसे में अगर फिल्म इंडस्ट्री के नायक-नायिका अगर शादी के बंधन में बंधते है या फिर प्यार की पींगे बढ़ाते हैं ,तो इसे भी बेचने में कोई बुराई नहीं.. आजकल की दुनिया में इसे पैसा बनाना कहा जाता है. सो, बॉलीवुड में आधा दर्जन से ज्यादा नायक-नायिका यहीं कर रहे हैं.
इस सूची में सबसे पहले नाम आता है ऐश्वर्या राय और उनके पति अभिषेक बच्चन का. वैसे तो जब से इन दोनों की शादी हुई है, इनकी कोई भी पिक्चर टिकट खिड़की पर ब्लाकबस्टर कमाई करने में कामयाब नहीं रही है. ऊपर से जब यह दोनों किसी फिल्म में साथ नजर आते हैं, तब तो हालत और ज्यादा बुरी हो जाती है. शादी के बाद ये दोनों जेपी दत्ता की उमराव जान, मणिरत्नम की गुरू और रावण में नजर आएं है, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म टिकट खिड़की पर ज्यादा कमाई नहीं कर पाई. बावजूद इसके, विज्ञापन की दुनिया में यह जोड़ी हिट है. वर्तमान में ये दोनों लक्स के विज्ञापन में साथ-साथ नजर आ रहे हैं और इनकी जोड़ी जमती भी है. बड़ी बात यह है कि फिल्मों की नाकामी के बावजूद उन्हें विज्ञापन से पैसा बराबर मिल रहा है. सो, बड़े पर्दे की यह नाकाम जोड़ी विज्ञापन की दुनिया में तो बदस्तूर बनी हुई है.
कुछ ऐसा ही हाल सैफ अली खान और उनकी प्रेमिका करीना कपूर का है. हाल ही में इनकी एक पिक्चर आई थी कुर्बान नाम से. दोनों ने इस पिक्चर में ढेर सारे रोमांस के दृश्य भी दिए थे, बावजूद इसके टिकट खिड़की पर यह पिक्चर औंधे मूंह गिरी थी. इससे पहले रोडसाइड रोमियो और टशन जैसी इन दोनों की फिल्में भी टिकट खिड़की पर चारों खाने चित्त हो गई थी. लेकिन अभि-ऐश की तरह ही विज्ञापन की दुनिया में इन दोनों की बादशाहत भी कायम हैं. एयरटेल और टाटा स्काय के विज्ञापनों में ये दोनों साथ-साथ नजर आते हैं और इन्हें पैसा भी खूब दिया जाता है. सो, बड़े पर्दे पर भले ही नाकाम हो, लेकिन विज्ञापन की दुनिया में यह जोड़ी भी हिट है.
जॉन अब्राहम और बिपाशा बासु के मामलें में भी ऐसा ही है. जिस्म को छोड़कर इनके साथ वाली कोई भी पिक्चर हिट नहीं हुई है, लेकिन विज्ञापन की दुनिया में इनकी भी खूब मांग है. दोनों अगर किसी विज्ञापन में साथ नजर आ जाएं, तो फिर समझिए कि उस विज्ञापन का हिट होना पक्का है.
ऐसा ही कुछ काजोल और अजय देवगन की जोड़ी के साथ भी है. वैसे तो ये दोनों एक साथ कम ही फिल्में करते हैं. लेकिन पिछले साल इन दोनों की एक पिक्चर आई थी यू मी और हम. इस पिक्चर का निर्देशन भी अजय ने किया था, बावजूद इसके यह फिल्म कब आई, कब गई, उनके प्रशंसकों को भी पता नहीं चला. लेकिन विज्ञापन की दुनिया में इनका भी सिक्का चलता है. वर्लपूल के विज्ञापन में ये दोनों लंबे समय से नजर आ रहे हैं और कामयाब भी है. इंडस्ट्री के बाकी सितारों के उलट, इन दोनों की जोड़ी दर्शकों को पारिवारिक माहौल का एहसास कराती है ,जिसके चलते विज्ञापन के हिट होने की संभावना भी बढ़ जाती है.
बात सीधी है, पिक्चरे भले ही पिटती रहे, लेकिन विज्ञापन से इनके घरों का चूल्हा तो जल ही जाता है. तो फिर ऐसे में, अपने प्यार को भूनाने में भला क्या एतराज है ? वैसे भी बॉलीवुड में सबकुछ बिक जाता है.

सनी की पीठ का दर्द फिर उभरा


ढाई किलों के हाथ वाले सदाबहार सनी देओल के प्रशंसकों के लिए एक बुरी खबर ः बॉलीवुड की एक्शन फिल्मों को नया अंदाज देने वाला यह अभिनेता आजकल अपनी शारीरिक दिक्कतों से जूझ रहा है. जी हां, बॉलीवुड के सर्वश्रेष्ठ एक्शन हीरों में शुमार किए जाने वाले सनी देओल के बारे में बूरी खबर यह है कि उन्हें पीठ में दर्द की पुरानी बिमारी ने एक बार फिर जकड़ लिया है. गौरतलब है कि सनी के साथ पीठ का दर्द लंबे समय से बना हुआ है. पिछले कुछ सालों में इसके इलाज के लिए सनी ने हरसंभव तरीका अपनाया है, फिर भी यह दर्द उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है.
हाल ही में इस पीठ की परेशानी ने सनी को एकबार फिर अपनी गिरप्त में ले लिया है, वह भी ऐसे समय जबकि उनके घरेलू विजेयता बैनर की फिल्म यमला पगला दीवाना में कई एक्शन दृश्य फिल्माएं जाने बाकी है. समीर कार्णिक के निर्देशन में बन रही इस पिक्चर में सनी अपने पिता धर्मेंद्र और भाई बॉबी देओल के साथ दिखाई देंगे. हरियाणा और पंजाब के कई हिस्सों में पिछले महीनों में इस फिल्म की सारी शूटिंग कर ली गई, लेकिन जब एक्शन दृश्यों को फिल्माने की बात आई, तो सनी की पीठ एक बार फिर दगा दी गई. परेशान करने वाली बात यह है कि इस बार सनी को सिर्फ पीठ ही नहीं,, बल्कि किडनी की समस्या से भी जूझना पड़ रहा है. किडनी की इस समस्या के लिए सनी हाल ही में लंदन से इलाज करवाकर लौटे है, लेकिन अब यह तय हो गया है कि अगले कई महीनें उन्हें घर पर ही आराम करना होगा.
सनी की इस बिमारी का असर सिर्फ यमला पगला दीवाना पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि निर्देशक नीरज पाठक की फिल्म गणित भी अधर में लटक गई है. सनी के करीबी दोस्त माने जाने वाले नीरज पाठक ने हाल ही में अपने पसंदीदा अभिनेता को लेकर उत्तरप्रदेश की राजनीति पर आधारित यह पिक्चर बनाने की घोषणा की थी.
लेकिन अब लगता है कार्णिक की तरह ही उन्हें भी लंबा इंतजार करना पड़ेगा. वैसे सनी के करोड़ों प्रशंसक तो यही दुआ मांग रहे है कि उनका चहेता एक्शन हीरो जल्द से जल्द अपनी दिक्कतों से निजात पा ले.

प्रियदर्शन बनाएंगे एक्शन फिल्म !!!


पिछले एक दशक में सिर्फ कॉमेडी फिल्मे ही बनाने वाले प्रियदर्शन अब कॉमेडी से उकता गए लगते हैं. या, यूं भी कहा जा सकता है कि दे दना दन, भूलभुलैया, खट्टा-मीठा जैसी फिल्मों की एक के बाद एक नाकामी से प्रियन घबरा गए है.
खैर, कुछ भी हो, लेकिन दिलचस्प खबर यह है कि प्रियदर्शन अपनी जो अगली पिक्चर बनाने जा रहे हैं, वह कॉमेडी नहीं होगी. जी हां, इसके उलट ‘बुलेट टेªन’ नाम की इस पिक्चर में अजय देवगन और समीरा रेड्डी आतंकवादियों की भूमिका में दिखाई देंगे. खबर अभी और भी है, तुषार कपूर और मनोज वाजपेयी जैसे कलाकार भी प्रियन की इस पिक्चर में काम करते दिखाई देंगे.
कहा जा रहा है कि प्रियन की यह पिक्चर 1994 में आई हॉलीवुड फिल्म स्पीड से प्रेरित है, जिसमें कॉनू रिव्स और सांद्रा बुलक ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी. अब चूंकि मामला प्रेरणा लेने का है, सो पूरी तरह से नकल तो की नहीं जा सकती. सो, प्रियन ने अपनी पिक्चर को ओरिजनल बनाने के लिए कहानी में इतना बदलाव कर दिया है कि इसमें नायक बस के बजाए टेªन को बचाने की कोशिश करेगा. इसके लिए लंदन के एक स्टेशन से इजाजत भी ली गई है, जहां पर पिक्चर की पूरी शूटिंग की जाएगी.
वैसे, प्रियदर्शन का अलग-अलग विषयों पर पिक्चर बनाना कोई नई बात नहीं. इससे पहले भी वे गर्दिश, विरासत जैसी सार्थक और गंभीर फिल्में बना चुके हैं. हाल ही में अपनी मातृभाषा तमिल में प्रियन ने कांचीवरम नामक एक सर्वश्रेष्ठ गंभीर और सार्थक फिल्म भी बनाई, जिसके लिए हाल ही में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया था.
वो तो अक्षय कुमार, परेश रावल और सुनील शेट्टी जैसे विशुध मसाला नायकों-अभिनेताओं की संगत में पड़कर प्रियन अपने असली सिनेमा से दूर चले गए थे.
लेकिन देर से ही सही,, अब प्रियन ने प्रयोग करने का जज्बा तो दिखाया है अपनी आगामी फिल्मों के साथ. उनके प्रशसंकों के लिए भी यकीनन यह राहतभरी खबर है.

Saturday, July 24, 2010

यशराज की लफंगे परिंदे


बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित और कामयाब फिल्मी धराने के तौर पर विख्यात यशराज कैंप तेजी के साथ बदल रहा है. इसकी झलक उनकी हालिया रिलीज हुई या होने जा रही फिल्मों के नामों को पढ़ने से ही हो जाती है. अब देखिए ना, यशराज कैम्प के बैनर तले अगले कुछ दिनों में एक पिक्चर रिलीज होने जा रही है, जिसका नाम रखा गया है-लफंगे परिंदे. इस पिक्चर में नील नीतिन मुकेश और दीपिका पादुकोण की जोड़ी है. नील इसमें गली के एक फाइटर बने हैं, वहीं दीपिका एक अंधी लड़की के किरदार में है. ठीक है, कहानी कुछ हटकर है, लेकिन फिर भी इस तरह का नाम वह भी यशराज बैनर की फिल्म का, तो चैंकना तो स्वाभाविक ही है.
लेकिन चैंकिए मत, क्योंकि हाल के सालों में यशराज कैम्प की फिल्मों के नामों पर गौर करें तो ज्यादातर नाम आप आम आदमी की जिंदगी से जुड़े हुए ही पाएंगे. जैसे कि कुछ महीनें पहले रिलीज हुई यशराज कैम्प की एक फिल्म का नाम था- बदमाश कंपनी. इस पिक्चर में शाहिद कपूर और अनुष्का शर्मा नायक-नायिका की भूमिका में थे. इससे पहले भी यशराज कैम्प से कुछ अजीबोगरीब नामों वाली फिल्में आई है जैसे कि-न्यूयार्क, काबूल लागा चुनरी में दाग, बंटी और बबली आदि.
अब आप सोचेंगे कि भला रोमांटिक फिल्मों के लिए विख्यात यशराज कैम्प में अब ये बदलाव की बहार क्यों बहने लगी है. तो जनाब,ये सब कामयाबी के हथकंडे हैं. दरअसल बात यह है कि पिछले कुछ सालों में यशराज घराने की फिल्में टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिरी है. बात यह है कि अब उनकी घिसी-पिटी रोमांटिक कहानियों में दर्शकों को कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है. ऊपर से तुर्रा यह कि यश चैपड़ा अब एक तरह से रिटायर हो चुके हैं, तो उनके बेटे आदित्य चैपड़ा का जादू पहली फिल्म दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे के बाद ही फीका पड़ गया.
सो, बाजार में बने रहने के लिए चैपड़ा घराने ने यह नया टेªंड अपनाया है. अब वे आतंकवाद पर आधारित न्यूयार्क और काबूल जैसी फिल्में बनाने से भी परहेज नही करते.
सो, अब उनकी लफंगे परिंदे देखने को तैयार हो जाइए. पिक्चर भले ही यशराज कैम्प की है, लेकिन उसमें आम मुंबईया जैसा पूरा मसाला मिलेगा आपको.

जन्मदिन विशेष ः मनोज कुमार


अबूताबाद, जो कि अब पाकिस्तानी सीमा के अंतर्गत आता है, में 24 जुलाई 1937 को जन्में मनोज कुमार का परिवार आजादी केे बाद राजस्थान आ गया, जब वे सिर्फ दस साल के थे. मनोज कुमार का वास्तविक नाम हरिकिशन गिरी गोस्वामी है. हरिकिशन गोस्वामी मनोज कुमार में कैसे तब्दील हो गया, इसकी भी एक कहानी है. दरअसल, मनोज कुमार को बचपन से दिलीप कुमार की फिल्में बेहद पसंद थी. दिलीप कुमार उनके पसंदीदा अभिनेता थे. जब 1949 में दिलीप कुमार की शबनम पिक्चर रिलीज हुई, तो गोस्वामी ने अपना नाम मनोज कुमार रख लिया. बस यही से मनोज कुमार के फिल्मी कॅरिअर की शुरूआत भी हुई. 1957 में रिलीज हुई फिल्म फेशन में संक्षिप्त भूमिका करने के बाद मनोज कुमार बड़े पर्दे पर पहली बार 1960 में आई कांच की गुड़िया में नायक की भूमिका में दिखाई दिए. लेकिन मनोज कुमार को टिकट खिड़की पर पहली कामयाबी 1962 में रिलीज हुई हरियाली और रास्ता से मिली,, जिसमें वे माला सिन्हा के नायक की भूमिका में नजर आए. इसके बाद 1964 में आई वो कौन थी, और 1965 में रिलीज हुई हिमालय की गोद में जैसी फिल्मों ने भी मनोज कुमार को टिकट खिड़की पर कामयाब अभिनेता बना दिया.
लेकिन मनोज कुमार के कॅरिअर में सबसे अहम मोड़ 1965 में फिल्म शहीद की रिलीज के साथ आया. भारत के महान स्वतंत्रता सैनानी भगतसिंह की जिंदगी पर आधारित इस फिल्म ने सिर्फ टिकट खिड़की पर कामयाबी के झंडे गाड़े, बल्कि इंडस्ट्री में मनोज कुमार को भी एक अलग पहचान दे दी. यह पहचान उन्हें एक ऐसे अभिनेता और निर्देशक-निर्माता के तौर पर मिली,, जो देशभक्ति से जुड़ी फिल्मंंे बनाने में महारत रखता है. इस पुख्ता पहचान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युध के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मनोज कुमार के सामने जय जवान, जय किसान थीम पर एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा. इसका नतीजा यह रहा कि 1967 में मनोज कुमार ने पहली बार निर्देशन की कमान संभालते हुए उपकार जैसी महान फिल्म बनाई. इस फिल्म में गुलशन बावरा द्वारा लिखा गया गीत मेरे देश की धरती सोना उगले, आज भी आजादी दिवस के मौके पर हर भारतीय की जबान पर होता है. इसके बाद 1970 में आई फिल्म पूरब और पश्चिम के साथ मनोज कुमार ने एक बार फिर देशभक्ति आधारित एक सर्वश्रेष्ठ फिल्म भारतीय सिनेमा को दी.
टिकट खिड़की पर कामयाबी के लिहाज से 1976 मनोज कुमार के कॅरिअर का सबसे यादगार साल रहा, जब उन्होंने रोटी कपड़ा और मकान, सन्यासी और दस नंबरी के तौर पर एक साथ तीन ब्लॉकबस्टर फिल्में दी. इसके बाद 1981 में मनोज कुमार की जिंदगी का सबसे यादगार पल आया, जब उन्होंने अपने गुरू दिलीप कुमार को क्रांति फिल्म में निर्देशित किया. देशभक्ति पर आधारित मनोज कुमार की पिछली फिल्मों की तरह ही क्रांति भी सुपरहीट साबित हुई.
लेकिन इसके बाद मनोज कुमार के कॅरिअर में गिरावट आना शुरू हो गई. बाद के सालों में उनकी सभी फिल्में नाकाम रही, जिसमें क्लर्क जैसी हाई-प्रोफाइल फिल्म भी शामिल है. 1995 में आई मैदान ए जंग बतौर अभिनेता मनोज कुमार की आखिरी फिल्म रही. हालांकि इसके बाद भी अपने बेटे कुणाल गोस्वामी को लेकर मनोज कुमार ने 1999 में जय हिंद नामक देशभक्ति पर आधारित एक और फिल्म बनाइ्र्र ,लेकिन तब तक उनका जादू ढल चुका था. नतीजा यह रहा कि यह फिल्म टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिर गई.
वर्तमान में, अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर मनोज कुमार फिल्मी दुनिया की चकाचैंध से दूर हो चुके हैं. लेकिन उनके प्रशंसकों को उनकी अदाएं और फिल्में आज भी लुभाती है. इंडस्ट्री के इतिहास में भी मनोज कुमार को एक ऐसे हरफनमौला के तौर पर जाना जाएगा, जिन्होंने बॉलीवुड को क्रांति, रोटी कपड़ा और मकान और शहीद जैसी महान फिल्में दी.

Friday, July 23, 2010

नाकामी के भंवर में फंसे अक्षय


दो साल पहले तक अक्षय कुमार को बॉलीवुड का सबसे बड़ा सितारा माना जाता था. ऐसा चमकता सितारा, जिसने शाहरूख, आमिर और सलमान जैसे खान सितारों की चमक को भी फीका कर दिया था. ऐसा सितारा जो एक के बाद एक ब्लॉकबस्टर फिल्मों के बाद बॉलीवुड का सबसे बिकाऊ और भरोसेमंद अभिनेता बन गया था.
लेकिन 2009 के बाद अगर अक्षय के कॅरिअर में एकदम से गिरावट आ गई है, तो इसकी सिर्फ एक वजह है-उनके द्वारा बार-बार एक जैसी ही भूमिकाएं करना और बार-बार घिसी-पिटी फिल्मों में कॉमेडी करते नजर आना. पिछले दो साल में अक्षय की लगभग हर पिक्चर टिकट खिड़की पर औंधें मंंूह गिरी है. इनमें चांदनी चैक टू चाइना, भागमभाग, दे दना दन, ब्ल्यू, तस्वीर जैसी बड़े बजट की फिल्में शामिल है. भागमभाग और दे दना दन अपनी लागत निकालने में तो कामयाब रही,, लेकिन ये पिक्चरें भी अक्षय की टिकट खिड़की पर हैसियत के माफिक कमाई नहीं कर पाई.
वजह बिल्कुल साफ है-अक्षय कुमार अपनी गलतियों से सबक लिए बगैर लगातार घटिया दर्जे की फिल्मों का चयन करते जा रहे हैं. एक जमाना था नब्बे के दशक का, जब अक्षय को एक्शन फिल्मों का बेताज बादशाह माना जाता था. नब्बे के दशक में अक्षय ने एक के बाद एक कामयाब एक्शन फिल्में देकर बीते जमाने के धर्मेंद्र की यादें ताजा कर दी थी. तब उन्हें खिलाड़ी कुमार कहा जाता था.
लेकिन प्रियदर्शन के साथ जुगलबंदी के बाद एक्शन के इस बेताज बादशाह को कॉमेडी फिल्में लुभाने लगी. प्रियदर्शन के साथ हेराफेरी,, भागमभाग, दे दना दन जैसी कॉमेडी फिल्में दी है उन्होंने. यहां तक तो खैर गनीमत थी, लेकिन दिक्कत यह कि अक्षय ने दूसरे निर्देशकों के साथ भी कॉमेडी फिल्में ही करना शुरू कर दी. विपुल शाह के साथ सिंह इज किंग, विपुल के साथ ही नमस्ते लंदन, नीरज वोरा के साथ फिर हेराफेरी जैसी कॉमेडी फिल्मों में अक्षय कुमार घिसी-पिटी भूमिकाओं में निचले दर्जे की कॉमेडी करते नजर आए.
इसका नतीजा यह हुआ है कि उनके कट्टर प्रशंसकों का धैर्य भी अब जवाब देने लगा है. एक जैसी घिसी-पिटी भूमिकाओं में देख-देखकर अब उनके प्रशंसक भी बोर होने लगे हैं. ऐसे दौर में जबकि आमिर सहित सभीा खान सितारें अपनी उम्र के हिसाब से अलग-अलग तरह की पिक्चरें करने लगे हैं, अक्षय अभी भी कॉमेडी फिल्मों के फेर में ही पड़े हुए है.
इसी का नतीजा है कि वे पिछले दो साल से एक अदद हिट पिक्चर के लिए भी तरस गए हैं. इस शुक्रवार रिलीज हुई खट्टा-मीठा में भी यही हाल है. प्रियदर्शन की यह कॅामेडी पिक्चर भी पहले दिन ही टिकट खिड़की पर औधें मूंह गिर गई है. और इसी के साथ अक्षय के खाते में एक और नाकामी दर्ज होने वाली है.
जाहिर है, यह अक्षय के लिए अपने कॅरिअर को लेकर फिर से मनन करने का वक्त है. अगर उन्हें खान सितारों को चुनौती देने लायक बनना है, तो पिक्चरों को लेकर अपने चयन को सुधारना होगा.

और अब...मूंछो वाले सलमान खान !


सलमान खान ने 22 साल के अपने कॅरिअर में हर तरह की भूमिकाएं की है- प्यार किया तो डरना क्या, हम आपके हैं कौन में रोमांटिक भूमिकाएं, वांटेड में एक्शन भूमिका, नो एंट्री,, बीवी नम्बर वन में कॉमेडी भूमिकाएं. लेकिन बॉलीवुड का यह बिंदास खान आज तक कभी मूंछो वाले नायक के तौर पर रूपहले पर्दे पर नजर नहीं आया.
लेकिन अब उनके प्रशंसकों की यह ख्वाहिश भी पूरी होने वाली है. जी हां, इस साल के आखिर में ईद के मौके पर सल्लू मियां की एक पिक्चर रिलीज होने जा रही है, नाम है दबंग. इस पिक्चर में सलमान खान एक बार फिर वांटेड की तरह ही अपराधियों को ठिकाने लगाने वाले नायक की भूमिका में दिखाई देंगे. लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इस पिक्चर में सलमान मूंछो के साथ दिखाई देंगे.
जी हां, इस पिक्चर के लिए सलमान ने विशेष रूप से मूंछे उगाई है. इस पिक्चर की कई खासियतें है. सबसे पहली खासियत यह कि यह बतौर निर्माता सलमान के बड़े भाई अरबाज खान की पहली पिक्चर है. जी हां, इस पिक्चर के साथ मलाइका अरोरा के शोहर भी निर्माता बनने जा रहे हैं. दूसरी खासियत यह कि इस पिक्चर का निर्देशन अभिनव कश्यप कर रहे हैं, जो कि बॉलीवुड को सत्या, नो स्मोकिंग, देव डी जैसी क्लासिक फिल्में देने वाले अनुराग कश्यप के छोटे भाई है. तीसरी खासियत यह कि इस पिक्चर के साथ सोनाली सिन्हा अपने कॅरिअर का आगाज कर रही है, जो कि बीते जमाने के सितारे शत्रुध्न सिन्हा की लाडली बिटिया है.
फिर भी,, इस पिक्चर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि सल्लू मियां इसमें मूंछों में पुलिसिया दादागिरी करते नजर आएंगे. तो तैयार हो जाइए, ईद के मौके पर सलमान की एक और ‘वांटेड’ देखने के लिए तैयार हो जाइए.

फिल्म समीक्षा ः खट्टा-मीठा में कुछ भी नहीं मीठा


अगर आप अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी वाली कोई भी फिल्म देखने जाएं तो आप एक बात के लिए तो बिल्कुल निश्चिंत रहते हैं कि फिल्म में कॉमेडी का भरपूर डोज होगा. आखिरकार इस जोड़ी ने दर्शकों को हेराफेरी,, दे दना दन, भागमभाग जैसी बेहतरीन कॉमेडी फिल्में दी है.
इस हप्ते रिलीज हुई खट्टा-मीठा को देखते वक्त भी यही उम्मीद रहती है कि फिल्म खूब हसांएगी,, खूब गुदगुदाएगी.
लेकिन अफसोस कि जैसे-जैसे 2 घंटे 40 मिनट की यह फिल्म आगे बढ़ती जाती है, दर्शक अपने आप को कोसने लगता है. उसे गुस्सा आता है खुद पर कि आखिर क्यों वह अक्षय कुमार और प्रियदर्शन केे नाम देखकर इस फिल्म को देखने आ गया. जी हां, खट्टा-मीठा में मीठा कुछ भी नहीं है. यह फिल्म न तो इस जोड़ी की पिछली फिल्मों की तरह गुदगुदाती है, न ही प्रशासनिक अमलें की कड़वी हकीकत को सामने ला पाती है, जिस थीम पर यह फिल्म बनी है.
जब आप व्यवस्था पर कटाक्ष करने वाली पिक्चर बनाते हैं, तो सबसे पहली जरूरत यह होतीे है कि आप मुद्दें को पूरी ईमानदारी से सामने लाए और कहानी को उसी के इर्द-गिर्द घूमाते रहे. लेकिन अफसोस कि इस पिक्चर में कहानी सिरे से गायब है. कहानी कभी सिस्टम पर प्रहार करती है, तो दूसरे ही पल प्रेमी-प्रेमिका के किस्सों में उलझ जाती है.
और हां, इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें अक्षय कुमार और नायिका त्रिशा के बीच प्यार-रोमांस को बहुत ही चलताऊ अंदाज में निपटाया गया है. वैसे भी प्रियदर्शन की फिल्मों में प्यार-रोमांस को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती है और इस पिक्चर में तो बिल्कुल भी नहीं दी गई है.
यह पिक्चर प्रियदर्शन के लिए भी नींद से जागने की चेतावनी देती है. प्रियन कॉमेडी में बेशक मास्टरी हासिल कर चुके हैं, लेकिन उनकी फिल्मों में कहानी को बड़ी तेजीे से भूला दिया जा रहा है. भागमभाग, दे दना दन जैसी फिल्मों में कॉमेडी तो बहुत थी, लेकिन कहानी का अता-पता नहीं था.
खट्टा-मीठा भी इसी तरह की पिक्चर है. इसमें कहानी के नाम पर कुछ भी नहीं है. ऐसा लगता है मानो कई दृश्यों को एक-साथ जोड़कर ढाई घंटे की पिक्चर बना दी गई है.
इसलिए भले ही आप प्रियदर्शन-अक्षय कुमार के पक्के प्रशंसक है, फिर भी इस पिक्चर से दूर ही रहिए और दुआ कीजिए कि अगली बार वे एक अच्छी कहानी वाली पिक्चर लेकर हाजिर हों.

Thursday, July 22, 2010

इस शुक्रवार: खट्टा-मिठा


निर्माता : श्री अष्टविनायक
निर्देषक: प्रियदर्षन
कलाकार: अक्षय कुमार, त्रिषा, उर्वषी शर्मा, मनोज जोषी.

अक्षय कुमार-प्रियदर्षन की जोड़ी हो तो दर्षकों को हर बार एक जबर्दस्त काॅमेडी फिल्म की ही उम्मीद रहती है. इस बार भी हंसी-ठहाकों के लिए मजबूर कर देने वाली यह जोड़ी काॅमेडी के तड़के के साथ हाजिर है. हां, इस बार फर्क जरा यह है कि फिल्म बिल्डरों और भूमाफियों की जिंदगी को व्यंग्यपूर्ण अंदाज में सामने लाते हैं. शायद यही वजह है कि निर्देषक प्रियदर्षन निर्माताओं से इस बात से नाराज है कि वे इस उद्देष्यपूर्ण फिल्म को काॅमेडी की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं.
कहानी: फिल्म की कहानी एक संघर्षरत कांटेªक्टर सचिन टिचकुले यानी अक्षय कुमार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी जिंदगी में कुछ कर गुजरना चाहता है. हालांकि उसका लक्ष्य बहुत दूर है, क्योंकि इस पेषे में रिष्वत खिलाने लायक पैसे भी नहीं है उसके पास. इस पर तुर्रा कि शहर की जो नई म्यूनिसिपल कमिष्नर आती है, वह टिचकुले की भूतपूर्व प्रेमिका है, जो अब उससे बेइंतहा नफरत करती है. इसके बाद टिचकुले किस तरह अपना कॅरिअर बनाता है और अपनी रूठी हुई प्रेमिका को मनाता है, यही फिल्म की कहानी है.

खास बात: प्रियदर्षन की ज्यादातर हिंदी फिल्में उनकी तमिल फिल्मों की रिमेक होती है. इस फिल्म को भी पहले प्रियेन तमिल में 1989 में मोहनलाल जैसे दिग्गज सितारें के साथ बना चुके हैं.

Wednesday, July 21, 2010

क्लासिक सिनेमा ः गंगाजल


बिहार की कानून-व्यवस्था पर बनी शूल की तरह ही प्रकाश झा की गंगाजल भी दर्शक के दिलो-दिमाग को गहरे तक भेदती है. 2003 में प्रकाश झा के बैनर तले रिलीज हुई यह फिल्म बिहार के भागलपुर जिले में बरसों पहले घटित हुए एक घटनाक्रम को दिखाती है. 1980 में भागलपुर के थाने में पुलिसकर्मियों ने 31 अपराधियों की आंखों में तेजाब डालकर उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अंधा बना डाला था.
प्रकाश झा की गंगाजल बिहार के तेजपुर जिले की कहानी कहती है, जहां अजय देवगन की सुपरिटेंडेंट आॅफ पुलिस के पद पर नियुक्ति होती है. तेजपुर में साध्ु यादव की हुकूमत चलती है, पुलिस भी उसके गुलाम है. लेकिन साध्ुा यादव और उसके बेटेे के आतंक वाले इस इलाकें में देवगन अपनी दबंगता और निर्भिकता से कानून राज कायम करते हैं. इस काम में उनकी पत्नी ग्रेसी सिंह और मातहत पुलिस कर्मचारी भी पूरा सहयोग देते हैं.
गंगाजल को बॉलीवुड की आॅल टाइम क्लासिक फिल्मों में इसलिए शुमार किया जाना चाहिए, क्योंकि यह फिल्म देश के सबसे भ्रष्ट राज्य की कानून-व्यवस्था की सच्चाई उजागर करती है. यह पिफल्म बताती है कि किस तरह अपनी जिंदगी जी रहा आम आदमी, उद्योगपति, पुलिसकर्मी यहां तक कि मीडियाकर्मी भी भ्रष्ट कानून व्यवस्था का शिकार होता है. यह फिल्म पुलिस और नेताओं के गठबंधन को पूरी निर्ममता से सामने लाती है. ई. निवास की शूल की तरह ही गंगाजल भी यह बताती है कि देश के राजनेताओं ने किस तरह कानून-व्यवस्था को अपनी रखैल बनाया हुआ है. किस तरह वे कानून का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते हैं.
गंगाजल इसलिए भी क्लॉसिक फिल्म है, क्योंकि यह जमीन से जुड़ी कहानी को पूरी ईमानदारी के साथ पर्दे पर उकेरती है. अजय देवगन पुलिस अधिकारी है, लेकिन वे टिपिकल मुंबईया हीरों की तरह दस-बीस गुंडों को मारते-पीटते नहीं है, बल्कि उन गुंडों से डरकर जीने वाले लोगों के दिलों में कानून-व्यवस्था के प्रति भरोसा और गुंडों के खिलाफ खड़े होने का साहस दिखाते हैं.
अगर आप भी अपने राज्य, शहर या कस्बे की कानून-व्यवस्था से त्रास्त हैं, तो फिर यह पिक्चर जरूर देखिए.

चल पड़ी उड़ान और तेरे बिन लादेन


पिछले शुक्रवार को रिलीज होने के बाद पहले तीन दिनों में भले ही लम्हा, उड़ान और तेरे बिन लादेन में दर्शकांे ने खास रूचि नहीं दिखाई, लेकिन धीरे-धीरे वे उड़ान और तेरे बिन लादेन को पसंद करने लगे हैं. लम्हा ने पहले हप्तें में भले ही 8.50 करोड़ रुपए कमाए हो, लेकिन फिल्म को आलोचक और दर्शक सभी ने नकार दिया है. इसके चलते सोमवार से ही फिल्म के कारोबार में 35-40 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई. इसके बाद यह साफ हो गया है कि संजय दत्त, बिपाशा बासु जैसे सितारों वाली यह फिल्म अपनी लागत भी नहीं निकाल पाएगी.
दूसरी ओर, खराब शुरूआत के बावजूद उड़ान और तेरे बिन लादेन अच्छा कारोबार कर रही है. इसकी वजह यह है कि जो दर्शक फिल्म देखने जा रहे हैं, उन्हें ये दोनों फिल्में पसंद आ रही है. उड़ान ने पहले सप्ताहांत में हालांकि 1.15 करोड़ रूपए ही कमाए, लेकिन 4 करोड़ के कम बजट में बनी फिल्म को लेकर उम्मीद लगाई जा रही है कि यह अपनी लागत वसूल लेगी और निर्माताओं को मुनाफा भी पहुचाएगी.
वहीं, तेरे बिन लादेन ने उड़ान से भी अच्छा कारोेबार कर दिखाया है. फिल्म ने पहले तीन दिनों में 3.75 करोड़ रुपए की कमाई की. सोमवार के बाद भी फिल्म के कलेक्शन में उत्साहजनक बढ़ोतरी हुई है. इंडस्ट्री में उम्मीद लगाई जा रही है कि यह कॉमेडी फिल्म भी भेजा Úॉय की तरह 2010 की ‘स्लीपर हिट’ साबित हो सकती है.
दोनों ही फिल्मों ने अच्छे कारोबार से यह साबित करने की कोशिश की है कि किसी भी फिल्म के लिए बड़े-बड़े सितारों से भी ज्यादा कहानी मायने रखती है.

Tuesday, July 20, 2010

रणबीर-इमरान की दुश्मनी


दो साल पहले उन दोनों को फिल्मपफेयर पुरस्कार समारोह के दौरान भले ही पक्के दोस्तों की तरह गले लगते-लगाते देखा गया हो, लेकिन अब यह खबर सुर्खियों में है कि इमरान खान और रणबीर कपूर के बीच दोस्ती गुजरे जमाने की बात हो गई है. कहा जा रहा है कि बॉलीवुड के ये दो सबसे चर्चित युवा सितारे अब एक-दूसरे से इस कदर नाराज हो गए है कि उनके बीच बातचीत भी बंद हो गई है. तो इसके पीछे वजह क्या है ? क्योंकि कुछ समय पहले तक इन दोनों को बॉलीवुड के सबसे पक्के दोस्तों में गिना जाता था. बीच में खबरें आई थी कि दोनों मिलकर एक प्रोडक्शन कंपनी खोलने जा रहे है. ये भी खबरें आई थी कि दोनों करण जौहर की एक फिल्म में भी साथ काम करने जा रहे है.
लेकिन अब शायद ही ऐसा हो पाए. वजह, इस दोस्ती में एक तीसरा कोण आ गया है. यह तीसरा कोण है इमरान की मंगेतर अवंतिका मलिक. दरअसल, यह कहानी उस थियेटर से शुरू होती है, जहां अवंतिका रणबीर की फिल्म राजनीति देखने गई थी. नाना पाटेकर, अजय देवगन, मनोज वाजपेयी जैसे दिग्गज सितारों की भीड़ में भी इस फिल्म में रणबीर के अभिनय को खूब सराहा गया था. लेकिन न जाने क्यों अवंतिका को रणबीर का काम जरा भी पसंद नहीं आया. सो, उन्होंने सिनेमाघर में फिल्म देखते-देखते ही रणबीर के अभिनय को लेकर ताने मारने शुरू कर दिए, वह भी इतनी तेज आवाज में कि आसपास बैठे सभी लोगों ने भी इसे सुन लिया.
बस यहीं से दो दोस्त अजनबी बन गए. जब रणबीर को इस बात का पता चला, तो उन्हें यह नागवार गुजरा. नतीजा यह कि अब दोनों के बीच बातचीत ही बंद हो गई है. इसका सबूत तब देखने को मिला जब रणबीर इमरान खान के मामा आमिर खान की फिल्म पिपली लाईव के प्रोमो लांचिंग के मौके पर बुलावे के बाद भी नहीं पहुंचे. इससे पहले रणबीर इमरान की फिल्म आई हेट लव स्टोरीज की स्क्रीनिंग पर भी नहीं पहुंचे थे. इसके बाद से ही चर्चाएं है कि बॉलीवुड के इन दो उभरते युवा सितारों के बीच का याराना भी अब भूली-बिसरी बात हो गया है.
वैसे भी, बॉलीवुड में दोस्त कब दुश्मन और दुश्मन कब दोस्त बन जाएं, कहा नहीं जा सकता है. यह पैसे, चमक-धमक और मौके का फायदा उठाने वालों की दुुनिया है, जहां अपना हित सर्वोपरी होता है. अब देखिए ना, सलमान खान और शाहरूख खान. ये दोनों सितारें भी कभी अच्छे दोस्त हुआ करते थे, लेकिन अब एक-दूसरे की सूरत देखना भी पसंद नहीं करते हैं. इन दोनों की दुश्मनी तो इस कदर गहरा चुकी है कि इंडस्ट्री भी इनकी लड़ाई के चलते दो खेमों में बंटी नजर आती है. वे निर्माता-निर्देशक जो सलमान खान के साथ काम करते हैं, शाहरूख की ओर भूलकर भी नहीं जाते. इसी तरह जिन फिल्मकारों के साथ शाहरूख काम करते है, सलमान उनसे दूर ही रहते हैं.
शाहरूख-सलमान की तरह ही शाहरूख-आमिर की दुश्मनी भी जगजाहिर है. बड़बोले शाहरूख खुद को बॉलीवुड का बादशाह बताते हैं और यही बात मिस्टर परफेक्सनिस्ट आमिर को पसंद नहीं. नतीजा यह कि दोनों के बीच विवाद अक्सर सुर्खियां बनते रहते हैं. आमिर अपने कुत्ते का नाम शाहरूख रखते हैं, तो शाहरूख ट्वीटर पर आमिर के खिलाफ जहर उगलते नजर आते हैं.
खान सितारों की तरह ही बॉलीवुड में इन दिनों संजय गुप्ता-संजय दत्त की दुश्मनी भी काफी चर्चित हैं. एक जमाना था, जब ये दोनों पक्के दोस्त हुआ करते थे. दोस्ती भी इस कदर पक्की कि दोनों ने मिलकर व्हाइट फीदर फिल्म्स के नाम से एक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी भी खोल ली. लेकिन अब दोनों की दोस्ती दुश्मनी में बदल चुकी है. दोस्ती की तरह ही दुश्मनी भी वे दिल से निभा रहे हैं, सो संजय दत्त ने पूरी इंडस्ट्री में फरमान सुना दिया है कि कोई भी गुप्ता की फिल्मों में काम न करें. सो, बेचारे संजय गुप्ता इंडस्ट्री के एक बड़े सितारें की दुश्मनी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.
इंडस्ट्री में यह नजारे आम है. कभी शाहरूख की खास निर्देशक का रूतबा रखने वाली पफराह खान आजकल सलमान के खेमें का हिस्सा बन गई है. रितेश देशमुख ने भी शाहरूख को छोड़कर सलमान का दामन थाम लिया है. बात सीधी सी है, जहां ज्यादा फायदा होगा, कदम भी उधर ही जाएंगे. बॉलीवुड का यह सीधा सा गणित है, जिसे छोटा बड़ा हर सितारा अपने व्यवहार में ले आता है.

कैटरीना चली अभिषेक के कैंप में


बॉलीवुड सितारों को लेकर भले ही सत्तर फीसदी से ज्यादा खबरे मनगढंत और फर्जी होती है, लेकिन बॉलीवुड की सबसे चर्चित जोड़ी सलमान खान और कैटरीना कैफ को लेकर इन दिनों जो बातें सामने आ रही है, वे सच्ची प्रतीत होती है. वैसे तो दोनों के संबंधें को लेकर हमेशा ही अटकलों का बाजार गर्म रहता है. महीने दो महीनें में दोनों के बीच अलगाव की खबरें आती ही रहती है. हालांकि इन खबरों के आने के तत्काल बाद ही आमतौर पर इस हाइप्रोफाइल प्रेमी जोड़े में से कोई इनकों खारिज करने के लिए भी मीडिया के सामने आ जाता है.
लेकिन इस बार मामला सचमुच में गंभीर लग रहा है. खबर है कि कैटरीना कैफ अभिषेक बच्चन के साथ काम करने जा रही है, वह भी एक-दो नहीं, बल्कि तीन फिल्मों में. कैट-अभिषेक की यह जोड़ी तरूण मनसुखानी की फिल्म दोस्ताना 2, विपुल शाह की एक रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म और निर्देशक जोड़ी अब्बास-मस्तान की इटॉलियन जॉब की रिमेक में काम करती दिखाई देंगी. अब यह एक बड़ी खबर है, क्योंकि अभिषेक और सलमान के बीच की दूरियां जगजाहिर है. जब से ऐश्वर्या राय ने सल्लू मियां का दामन छोड़कर अभिषेक को जीवनसाथी बनाया, तभी से बच्चन परिवार हमेशा के लिए सलमान से दूर हो गया. अभि-ऐश के विवाह के बाद से ही सलमान बच्चन परिवार के किसी भी सदस्य के साथ सार्वजनिक जगहों पर या फिल्मों में नजर नहीं आए हैं. अब कैटरीना है सलमान की करीबी दोस्त ! तो जब यह करीबी दोस्त जूनियर बच्चन के साथ एक साथ तीन फिल्मों में काम करने जा रही है तो सलमान-कैट के रिश्तों को लेकर कयास उठना तो स्वाभाविक ही है.
वैसे, कैटरीना हमेशा कहती रही है कि इंडस्ट्री में सलमान उनके सबसे बड़े गॉडफादर है. तो, क्या इस बार कैटरीना अपने गॉडफादर को अंगूठा दिखाने के मूड में आ गई है? उम्मीद करते हैं कैट-सल्लू से जुड़ी पुरानी खबरों की तरह ही यह खबर भी अफवाह ही साबित हो.

Monday, July 19, 2010

कश्मीर और बॉलीवुड


साठ-सत्तर के दशक में भले ही विद्रोही अभिनेता के तौर पर विख्यात शमी कपूर को उनके चाहने वालों ने कश्मीर की बर्फीली वादियों में याहू-याहू गाते देखा हो, लेकिन ध्रती का स्वर्ग कही जाने वाली घाटी बीतें सालों में पूरी तरह से बदल चुकी है. अब वहां के अप्रतिम सौंदर्य को आतंकवाद की वीभिषिका ने पूरी तरह लील लिया है. घाटी में आतंकवाद की जड़े जैसी-जैसी गहरी होती गई, बॉलीवुड के फिल्मकारों ने भी उसे अपनी फिल्मों की कहानी बनाना शुरू कर दिया. बीतें तीन दशकों में कश्मीर पर आधरित ऐसी ही चंद फिल्मों पर एक नजर, जिन्होंने दर्शकों के दिलों को गहरे से छुआ ः
रोजा 1992 ः मणिरत्नम की यह फिल्म एक ऐसे नवविवाहित जोड़े की कहानी है, जो शादी के बाद ही तत्काल घाटी की ओर कूच कर देता है, क्योंकि पति वहां सेना में अधिकारी के तौर पर तैनात है. लेकिन पत्नी के लिए जल्द ही स्थिति नारकीय हो जातीे है, जब उसके पति केा आतंकवादी अपने कब्जें में ले लेते हैं. अरविंद स्वामी, मध्ुा की प्रमुख भूमिकाओं वाली इस फिल्म में मणिरत्नम ने घाटी के हालात पूरी ईमानदारी और दिलेरी से उकेरे हैं.
मिशन कश्मीर 2000 ः विध्ुा विनोद चोपड़ा की इस फिल्म में घाटी की खूबसूरती के साथ ही संजय दत्त, रितिक रोशन, प्रिटी जिंटा जैसे बड़े सितारों का मन मोह लेने वाला अभिनय भी था. संजय दत्त एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में थे और रितिक रोशन उनके गोद लिए हुए बेटे की भूमिका में, जो बड़ा होकर आतंकवादी बन जाता है.
यहां 2005 ः एड फिल्मों के निर्देशक सूजीत सिरकर की यह फिल्म कमाल की है. फिल्म में नायिका मीनिषा लांबा एक कश्मीरी लड़की की भूमिका में है, जिसे सेना के एक जवान से प्यार हो जाता है. लेकिन कहानी में ट्वीस्ट यह है कि नायिका का भाई आतंकवादी है. यह फिल्म कश्मीर में युवाओं के आतंकवाद का रास्ता अपनाने की कहानी को पूरी हकीकत के साथ बयां करती है.
तहान 2008ः संतोष सिवन की इस फिल्म में एक मासूम बच्चे और उसके गध्ेा की कहानी है. फिल्म में बच्चे की नजर से घाटी में पनपते आतंकवाद को दिखाया गया है. एकदम सीधे सरल और दिल को छू जाने वाले अंदाज में यह फिल्म एक सार्थक संदेश दे जाती है.
कारगिल एलओसी 2003ः बार्डर जैसी महान फिल्म बनाने के बाद जेपी दत्ता ने इंडस्ट्री के दो दर्जन से भी ज्यादा सितारों को लेकर कारगिल युध पर आधारित यह फिल्म बनाई थी. फिल्म तो घटिया साबित हुई, लेकिन इसके गीत-संगीत ने खूब तारीफें बटोरी.
फना 2006 ः निर्देशक कुणाल कोहली की इस फिल्म में आमिर खान एक आतंकवादी की भूमिका में नजर आते हैं, जो अपने मिशन को पूरा करने के लिए एक अंधी लड़की को प्यार के जाल में फंसाते हैं. पिक्चर इंटरवल के बाद बोझिल हो जाती है, लेकिन गीत-संगीत इसका भी बेहद उम्दा है.
सिकंदर 2009ः निर्देशक पियुष झा इस फिल्म में फुटबॉल के दीवाने एक बारह वर्षीय लड़के के माध्यम से बताते हैं कि घाटी में किस तरह मासूम बच्चों को आतंकवाद की अंध्ेरी खाई में धकेला जा रहा है. यह फिल्म घाटी की राजनीति को लेकर भी सवाल खड़े करती है.

दर्शकों को कैसी फिल्में पसंद है ?



पिछले सप्ताह रिलीज हुई तीन फिल्मों-लम्हा, उड़ान और तेरे बिन लादेन-का एक जैसा ही हश्र हुआ. तीनों ही फिल्मों को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया. नतीजा यह रहा कि जुलाई के पहले सप्ताह में आई हेट लव स्टोरीज की धमाकेदार कामयाबी के बाद इंडस्ट्री में जो उत्साह आया था, वह वापस ठंडा पड़ गया है.
पिछले हप्ते की तीनों फिल्मों के टिकट खिड़की पर औंध्ेा मूंह गिर जाने से यह सवाल एक बार फिर उभरकर आता है कि आखिर दर्शकों की पसंद क्या है? आखिर दर्शकों को किस तरह की फिल्में पसंद आती है, जिन्हें देखने के लिए वे सिनेमाघरों की ओर दौड़े चले आते हैं ?
पिछले हप्ते रिलीज हुई तीन फिल्मों के आधार पर ही यह जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर दर्शकों ने इन फिल्मों को क्यों नकार दिया ? सबसे पहले बात लम्हा की. बंटी वालिया जैसे निर्माता और राहुल ढोलकिया जैसे निर्देशक की इस फिल्म में संजय दत्त, बिपाशा बासु जैसे बड़े सितारे थे. बावजूद इसके दर्शक फिल्म देखने नहीं गए. फिल्म विश्लेषकों का मानना था कि पिक्चर कश्मीर आतंकवाद जैसी गंभीर समस्या पर आधरित है, इसलिए दर्शकों ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई. चलों, मान लेते हैं कि दर्शक गंभीर फिल्मों को कम ही पसंद करते हैं. इसके साथ ही लम्हा को आलोचकों ने भी खारिज कर दिया था, इसलिए पिक्चर के इसीे अंजाम की आशंका थी.
लेकिन लम्हा के साथ रिलीज हुई बाकी दो फिल्मों-उड़ान और तेरे बिन लादेन को दर्शकों ने क्यों नकार दिया ? ये दोनों फिल्में भले ही कम बजट और छोटे कलाकारों की फिल्में थी. लेकिन इनकी सबसे बड़ी खूबी इनकी दमदार और नयापन ली हुई कहानी थी. दोनों ही फिल्मों को विश्लेषकों ने भी खूले दिल से सराहा था. तेरे बिन लादेन के बारे में कहा जा रहा है कि यह फिल्म पिछले पांच-छह सालों में आई कॉमेडी फिल्मों में सबसे अच्छी है. सलमान खान जैसे सितारे ने भी अपने ट्वीटर खाते पर इस फिल्म की खूब तारीफ की. वहीं उड़ान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी खूब सुर्खियां बटोर रही है. इस पिक्चर की कहानी अनुराग कश्यप ने निर्देशक के साथ मिलकर लिखी है.
बावजूद इसके अगर दर्शकों ने इन दोनों फिल्मों को भी नकार दिया है, तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि अब अच्छी कहानी भी फिल्म के हिट होने की गारंटी नहीं ? पिछले चंद सालों में आमिर, ए वेडनसडे, खोसला का घोंसला जैसी छोटी फिल्में अपनी कहानी के बूते ही हिट साबित हुई थी. इसके बाद यह उम्मीद जगी थी कि अब दर्शक बड़े सितारों के बजाए अच्छी कहानी को तवज्जो देने लगे हैं.
लेकिन अब उड़ान और तेरे बिन लादेन जैसी अच्छी फिल्मों की नाकामी ने दर्शकों की पसंद को लेकर फिर सभी को असमंजस की स्थिति में डाल दिया है.

Thursday, July 15, 2010

क्लासिक सिनेमाः शूल



हर किसी का नजरिया अलग होता है और चीजों को परखने, देखने की दृष्टि भी अलग-अलग. यही बात फिल्मों के मामलें में भी लागू होती है. फिल्मों के शौकीन हर व्यक्ति की कुछ पसंदीदा फिल्में है, जिन्हें वह देखने के कई सालों बाद भी अपने दिलो-दिमाग में बसाए हुए रखता है. इसीलिए जब मैं अपनी पसंदीदा फिल्मों के बारे में लिखने बैठा, तो जो फिल्म मेरे दिमाग में सबसे पहले आई, वह थी- शूल. 1990 में रिलीज हुई निर्देशक ई निवास की इस फिल्म ने मुझे हमेशा अपनी ओर खींचा है, झिंझोड़ा है, सोचने को मजबूर किया है.
तो, अनुराग कश्यप की कलम से निकली शूल में बिहार में राजनीति और अपराध के बीच की मिलीभगत को दिखाया गया है. यह फिल्म एक युवा पुलिस जवान मनोज वाजपेयी की कहानी कहती है, जिसका तबादला बिहार के मोतिहारी जिले में होता है. इस इलाके में दबंग नेता और अपराध जगत के सरगना बच्चु यादव का राज है. राज भी इस कदर कि पुलिस वाले भीे सरकार से ज्यादा उनके लिए काम करते हैं और उनसे तनख्वाह भी लेते हैं. लेकिन मनोज वाजपेयी वसूलों वाला इंसान है, इसका विरोध करता है. इसका खामियाजा आखिर में उसे अपनी बेटीे और पत्नी को खोकर भूगतना पड़ता है. क्लाइमेक्स में मनोज वाजपेयी बच्चू यादव और उसके डर को खत्म भी करता है और सिस्टम के ऊपर कई सवाल भी दागता है.
यही सवाल पिक्चर पूरी होने के बाद दर्शक के मन में खलबली मचाते रहते है. फिल्म में मनोज वाजपेयी से यही गलती होती है कि वह अपनी ड्यूटी को ईमानदारी से निभाता है. इसी के चलते उसे अपना सबकुछ खोना पड़ता है. फिल्म के आखिर में मनोज वाजपेयी देश के नेताओं से पूछता है कि क्या हमें झूठी शपथ दिलाई गई थी,, कर्तव्य निष्ठा की ?
यह फिल्म इस ओर भी इशारा करती है कि देश की राजनीति का किस कदर अपराधीकरण हो चुका है. नेता गुंडों में तब्दील हो गए है और अब वे गुर्गे पालने लगे हैं. ऐसे में आम आदमी बेचारा कहां जाएं, कैसे जिंदगी जिए ? तो फिर क्या आज की तारीख में बेईमानी ही एकमात्र विकल्प बची है, जैसा कि मनोज वाजपेयी के दोस्त करते हैं ?
फिल्म में मनोज वाजपेयी का किरदार भी कमाल का है. उन्होंने अपना रोल इस समर्पण के साथ निभाया है कि दर्शक वाह-वाह करते रह जाते हैं.
फिल्म बिहार की राजनीति की एकदम सच्ची तस्वीर उकेरती है. साथ ही यह राजनीति में घूस आई गंदगी को भी निर्मम तरीके से सामने लाती है और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है.
अगर आपकों देश की कानून-व्यवस्था पर आधारित कोई फिल्म देखनी है, तो बस फिर यह फिल्म आपके लिए ही है.

भुला दिए गए अभिनेता


निर्माता-निर्देशक ही नहीं, बॉलीवुड में दर्जनों ऐसे भूला दिए गए सितारे भी है, जो अपने दौर में लाखों-करोड़ों लोगों के नायक हुआ करते थे. लेकिन या तो बदलते वक्त के साथ वे कदमताल मिलाकर चल नहीं पाए, या फिर शुरूआती सफलता के बाद कामयाबी उनसे हमेशा-हमेशा के लिए दूर चली गई. नतीजा यह हुआ कि कुछ समय के लिए कामयाबी और शोहरत के शीर्ष पर रहने के बाद हमेशा के लिए गुमनामी के अंधेरे में खो गए.
ऐसे अभिनेताओं में सबसे पहले राहुल रॉय का नाम आता है. 1990 में प्रख्यात फिल्म निर्देशक महेश भट्ट ने राहुल रॉय को केंद्रीय भूमिका में लेकर आशिकी नामक फिल्म बनाई थी. अच्छे संगीत, बढ़िया कहानी और उम्दा निर्देशन के बूते आशिकी उस साल की सबसे कामयाब फिल्म साबित हुई थी. खासकर फिल्म के गानों ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया था और फिल्म के गायक कुमार सानु, गायिका अनुराधा पोडवाल और संगीतकार नदीम-श्रवण सभी रातों-रात संगीत की दुनिया के सबसे चमकते सितारे बन गए थे. सितारा तो तब राहुल रॉय का भी खूब चमका. आशिकी की धमाकेदार कामयाबी के बाद राहुल को इंडस्ट्री में हाथों-हाथ लिया गया. हर निर्माता-निर्देशक उनके साथ काम करने के लिए उनके घर, आॅफिस के चक्कर काटने लगा. आशिकी के बाद के सालों में राहुल रॉय ने जुनून, तेरी कहानी फिर याद आई, सपने साजन के, जनम जैसी दर्जनों फिल्में की, लेकिन अफसोस कि उनमें से किसी भी फिल्म को टिकट खिड़की पर कामयाबी नहीं मिल पाई. नतीजा यह हुआ कि राहुल रॉय जितनी तेजी से शीर्ष पर पहुंचे, उतनी ही तेजी से जमीन पर भी पहुंच गए. कुछ और फिल्मों की नाकामी के बाद इंडस्ट्री के लोगों ने भी राहुल से किनारा करना शुरू कर दिया. अब राहुल रॉय फिल्म इंडस्ट्री से पूरी तरह विदा हो चुके हैं. आखिरी बार उन्हें नॉटी बॉय नामक एक सी-ग्रेड की फिल्म में देखा गया था, जिसके बाद राहुल का कॅरिअर हाल-फिलहाल तो थम गया लगता है. 1990 में आशिकी की धमाकेदार कामयाबी के बाद इंडस्ट्री को उम्मीद थी कि राहुल रॉय राजेश खन्ना की तरह ही रोमांटिक हीरों बनकर उभरेंगे, लेकिन अफसोस कि राहुल की कामयाबी पहली फिल्म तक ही सीमित रह गई.
राहुल रॉय की तरह ही कुमार गौरव की भी यही कहानी है. कुमार गौरव को तो बॉलीवुड विरासत में मिला था, उनके पिता राजेंद्र कुमार अपने जमाने के सबसे बड़े सितारे थे. कहा जाता है कि जितनी ब्लॉकबस्टर फिल्में राजेंद्र कुमार ने अपने जमाने में दी, उतनी तो शाहरूख खान और अमिताभ बच्चन ने भी नहीं दी है. इसी वजह से राजेंद्र कुमार को बॉलीवुड का ‘जुबली कुमार’ भी कहा जाता है. जब कुमार गौरव ने जवानी में कदम रखा, तो राजेंद्र कुमार ने अपने बेटे को धमाकेदार ढंग से लांच करने के लिए 1981 में लव स्टोरी नामक पिक्चर बनाई. राहुल रॉय की आशिकी की तरह ही कुमार गौरव की लव स्टोरी भी अच्छे गीत-संगीत और रोमांटिक कहानी के चलते उस साल की सबसे कामयाब फिल्म साबित हुई. जुबली कुमार के बेटे कुमार गौरव रातों-रात स्टार बन गए. लेकिन उनकी किस्मत भी पहली फिल्म के बाद ही रूठ गई. बाद के सालों में कुमार गौरव ने तेरी कसम, लवर्स, रोमांस, हम है लाजवाब, आल राउंडर्स जैसी दर्जनों फिल्में की, लेकिन फिर भी वे अपनी पहली फिल्म की कामयाबी को नहीं दोहरा पाए. बेटे के गिरते कॅरिअर ग्रॉफ को देखते हुए राजेंद्र कुमार ने एक बार फिर उनके लिए पिक्चर बनाई- नाम. इसमें उन्होंने अपने दामाद संजय दत्त को भीे लिया. उस वक्त संजय दत्त एक गुमनाम सितारे से ज्यादा कुछ नहीं थे. नाम 1986 में रिलीज हुई और साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई, लेकिन कुमार गौरव का दुर्भाग्य यह रहा कि इस फिल्म की कामयाबी का पूरा श्रेय संजय दत्त ले गए और कुमार गौरव एक बार फिर खाली हाथ ही रह गए. इसके बाद भी कुमार गौरव ने गुंज, आज, गैंग जैसी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन उनके हाथ नाकामी ही लगी. आखिरकार, थक-हारकर कुमार गौरव ने भी फिल्मों से किनारा कर लिया. कई सालों के बाद कुमार गौरव के बारे में पिछले साल सुनने में आया कि वे मॉय डेडी स्ट्रांगेस्ट नामक एक फिल्म में काम कर रहे है. लेकिन इस फिल्म का भी आजतक कुछ पता नहीं चला.
1991 में सुभाष घई जैसे महान निर्देशक की फिल्म सौदागर के साथ अपने कॅरिअर की शुरूआत करने वाले विवेक मुश्रान भी बॉलीवुड के लिए ‘वन फिल्म वंडर’ ही साबित हुए. सौदागर एक बड़े बजट की फिल्म थी, इसमें दिलीप कुमार और राजकुमार जैसे महानायक काम कर रहे थे. फिल्म भी साल की सबसे बड़ी हिट साबित हुई और विवेक मुश्रान भी राहुल रॉय और कुमार गौरव की तरह ही रातों-रात स्टार बन गए. लेकिन फिर वहीं कहानी, बाद की उनकी फिल्में एक के बाद एक पिट गई. नतीजतन राम जाने, फस्र्ट लव लेटर, अंजाने जैसी कुछ भुला देने लायक फिल्मों में काम करने के बाद विवेक मुश्रान को भी इंडस्ट्री से रूखसत होना पड़ा. कई सालों की गुमनामी के बाद आजकल वे छोटे परदे पर नजर आने लगे हैं. स्टार प्लस के धारावाहिक सोनपरी, जीटीवी के धारावाहिक किटी पार्टी में वे चरित्र भूमिकाओं मे नजर आते हैं. लेकिन उस सितारा हैसियत को वे सालों पीछे छोड़ चुके है, जो सौदागर फिल्म की रिलीज के बाद नब्बे के दशक में उन्हें हासिल हुई थी.
ऐसा ही कुछ हाल मासूम फिल्म में बाल कलाकार के तौर अपने कॅरिअर की शुरूआत करने वाले जुगल हंसराज का भी हुआ. 1983 में गुलजार की लिखी हुई कहानी पर बनी मासुम अब अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक शेखर कपूर के कॅरिअर की पहली फिल्म थी. यह फिल्म बड़ी हिट साबित हुई और मान लिया गया कि जवानी में जुगल हंसराज भी बड़े सितारे बनेंगे. लेकिन बतौर नायक मोहब्बतें, आ गले लग जा जैसी चंद फिल्मों के बाद जुगल हंसराज के कॅरिअर का भी वही हश्र हुआ, जो राहुल रॉय, विवेक मुश्रान और कुमार गौरव का हुआ. इंडस्ट्री के सबसे प्रतिष्ठित फिल्मी घराने यशराज कैम्प से जुगल ने बतौर निर्देशक फिर से अपनीे फिल्मी पारी की शुरूआत की. पिछले तीन सालों में उन्होंने बतौर निर्देशक इस कैम्प के लिए रोडसाइड रोमियो और प्यार इंपासिबल जैसी फिल्में भी बनाई, लेकिन दोनों ही फिल्में टिकट खिड़की पर नाकाम रही. इसके बाद बतौर निर्देशक भी अब जुगल के कॅरिअर पर पूर्णविराम लगता नजर आ रहा है.
इंडस्ट्री में ऐसे कई कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी पहली फिल्म से सितारा हैसियत हासिल कर ली थी, लेकिन इस अच्छी शुरूआत का फायदा उठाकर वे इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने में नाकाम रहे. नतीजा यह कि आज वे गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं.

Wednesday, July 14, 2010

आमिर की पिपली लाइव और विवाद

13 अगस्त को रिलीज होने जा रही आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म पिपली लाईव इन दिनों विवादों के घेरे में है. विवाद फिल्म के लोकप्रिय हो चुके गाने ‘महंगाई डायन खाय जात है’ को लेकर है. दरअसल, यह गाना मध्यप्रदेश के बदवाई गांव के एक मास्टर गयाप्रसाद प्रजापति का है, जो इसे लंबे समय से एक लोकगीत के रूप में अपने ग्रुप के साथ गाते रहे हैं. प्रजापति साहब से यह गाना फिल्म की निर्देशिका और पत्रकार अनुषा रिजवी ने खरीदा था. लेकिन अब जबकि फिल्म का यह गाना राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है, प्रजापति का आरोप है कि निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें मात्र 11,000 रुपए का मेहनताना देकर समझा दिया, जो कि आज के हिसाब से बहुत कम पैसा है.
हालांकि आमिर खान ने प्रजापति सहित उनके सभी साथियों को मुंबई बुलाकर चंद लाख रूपए दे दिए हैं और विवाद को खत्म करने की कोशिश की है. लेकिन सवाल यह है कि हमेशा आमिर के साथ ही ऐसा क्यों होता है ? आखिर, हमेशा फिल्म की रिलीज से पहले आमिर विवादों के बीच कैसे आ जाते हैं. थ्री इडियट्स की रिलीज से पहले उपन्यासकार चेतन भगत ने फिल्म के निर्माता विध्ु विनोद चैपड़ा पर कहानी चुराने का आरोप लगाया था. तब आमिर भी इस विवाद में कूद पड़े थे. खूब बयानबाजी की थी उन्होंने उस वक्त. उसका असर भी हुआ, थ्री इडियट्स भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म साबित हुई. इससे पहले मंगल पांडे की रिलीज के पहले भी ऐसा ही एक विवाद खड़ा हुआ था. आमिर के निर्देशन में बनी फिल्म तारे जमीं पर की रिलीज से पहले भी एक विवाद खड़ा हुआ था, जब आमिर पर अमोल गुप्ते ने आरोप लगाया था कि फिल्म के असली निर्देशक वे हैं और आमिर जबरन का श्रेय ले रहे हैं.
तो आखिर फिल्म की रिलीज से पहले आमिर हमेशा विवादों में क्यों आ जाते हैं ? याद कीजिए, आमिर के बारे में इंडस्ट्री मे कहा जाता है कि वे मिस्टर परफेक्सनीस्ट है, हर कदम सोच समझकर उठाते हैं. कहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि वे अपनी फिल्मों को रिलीज से पहले अच्छा-खासा प्रचार दिलाने के लिए यह सारे फंडे आजमाते हैं. वैसे भी आमिर मार्केटिंग के उस्ताद है. दर्शकों को अपनी पिक्चर की ओर कैसे खींचा जाएं, यह उनकों अच्छे से मालुम हैं. शायद यही वजह है कि आमिर की हर फिल्म रिलीज से पहले एक ऐसे विवाद में पड़ जाती है, जिसके चलते उसे बिना कुछ भी खर्चा किए देश के सभी समाचार पत्रों, टीवी चैनलों में मुप्त प्रचार मिल जाता है.
अगर ऐसा है, तो पिपली लाईव के साथ भी बिल्कुल यही हो रहा है. विवादों के चलते आमिर की यह फिल्म भी रिलीज से पहले हीे हिट नजर आ रही है. सही हो या गलत, आमिर का दांव हमेशा की तरह ही इस बार भी सही साबित हो रहा है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आमिर जैसे श्रेष्ठ अभिनेता को ऐसे प्रचार की जरूरत है, जिनकी फिल्म को देखने के लिए दर्शक वैसे ही सिनेमाघरों की ओर दौड़े चले आते हैं.

फिल्मकार, जो भुला दिए गए


बॉलीवुड में एक पुरानी कहावत है ः जो दिखता है, वो बिकता है. और जो नहीं दिखता, मतलब जो बिकाऊ नहीं रह जाता है, उसे रातों-रात भुला दिया जाता है. इस चमक-धमक में बने रहना खासा मुश्किल है और जो वक्त के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते हैं, वे धीरे-धीरे इस चकाचैंध की दुनिया से ओझल हो जाते हैं. बॉलीवुड से जुड़े सभी लोगों के साथ यही होता है फिर चाहे वे निर्देशक हो, निर्माता हो या हीरो-हिरोईन. सभी को इंडस्ट्री में टिके रहने के लिए हर दिन जूझना पड़ता है और जो संघर्ष नहीं कर पाता है उसे इस ग्लैमरस दुनिया से बाहर फेंक दिया जाता है.
सबसे पहले बात करते हैं, उन निर्माता-निर्देशकों की जो कुछ अरसा पहले तक बॉलीवुड के आकाश में चमकते सितारे थे, लेकिन आज पूरी तरह ओझल हो चुके हैं. सबसे पहले ध्यान आता है, नब्बे के दशक के शीर्ष निर्माता वासु भगनानी का. नब्बे के दशक के उस दौर में गोविंदा की कॉमेडी फिल्मों की तूती बोला करती थी और निर्देशक डेविड धवन उस समय के सबसे बिकाऊ और सफलता की सौ फीसदी गारंटी देने वाले निर्देशक हुआ करते थे. वासु भगनानी ने इन्हीं दो के साथ मिलकर कईं ब्लॉकबस्टर फिल्में दी. नब्बे के दशक में इस तिकड़ी ने इंडस्ट्री को कुली नम्बर वन, बड़े मियां छोटे मियां, बीवी नम्बर वन जैसी कामयाब फिल्में दी. बतौर निर्माता वासु भगनानी ने अन्य सितारों के साथ भी बीवी नम्बर वन, मुझे कुछ कहना है जैसी कामयाब फिल्में देकर इंडस्ट्री के नम्बर वन निर्माता का तमगा भी हासिल कर लिया था. लेकिन दर्शकों के फिल्मों का टेस्ट बदलने के साथ ही गोविंदा और डेविड धवन भी नकार दिए गए तो वासु भगनानी का धंधा भी चैपट हो गया. पिछले पांच साल में उन्होंने कोई कामयाब फिल्म नहीं दी है. पिछले साल ही उनकी कल किसने देखा और डू नॉट डिस्टर्ब जैसी फिल्में टिकट खिड़की पर औध्ेंा मूंह गिर गई. कामयाबी उनसे दूर है, तो इंडस्ट्री के बिकाऊ सितारों ने भी उनसे दूरियां बना ली है. अपने बेटे जैकी को उन्होंने कल किसने देखा में लांच किया, तो इस फिल्म में मेहमान भूमिका करने से भी इंडस्ट्री के कई बड़े सितारों ने मना कर दिया. फिल्म जैसे-तैसे रिलीज हुई और किसी बड़े सितारें के न होने से पिट गई. अब तो वासु भगनानी को सितारो के पीछे भागना पड़ रहा है. नब्बे के दशक का यह हिट निर्माता अपने बेटे जैकी को लेकर अब एक और फिल्म बनाना चाहता है, ताकि बेटे का कॅरिअर पटरी पर आ जाए. इस बार भी फिल्म में मेहमान भूमिका के लिए भगनानी ने अक्षय कुमार से बात की, लेकिन खिलाड़ी कुमार ने उनकी नाकामी को देखते हुए साफ इंकार कर दिया. इसके बाद यह लगभग तय हो गया है कि नब्बे के दशक का निर्माता नम्बर वन अब गुमनामी के अंधेंरे में खो जाएगा.
कुछ ऐसा ही हाल जेपी दत्ता का भी है. जेपी दत्ता, यानी वह निर्देशक जिसने बार्डर, रिफ्रयूजी जैसी फिल्में बनाई है. कारगील एलओसी नामक फिल्म में तो उन्होंने इंडस्ट्री के 28 से भी ज्यादा छोटे-बड़े नायकों को काम करने के लिए मना लिया था. जेपी दत्ता की उस फिल्म में मानों पूरी इंडस्ट्री ही इकट्ठा हो गई थी. तब जेपी दत्ता की फिल्म इंडस्ट्री में तूती बोलती थी. लेकिन अब हालात उनके लिए भी बदल गए हैं. दत्ता की पिछली फिल्म उमराव जान टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिरी थी. और इंडस्ट्री का रिवाज है कि यहां टिकट खिड़की पर नाकाम साबित हुए लोगों को कोई नहीं पूछता. सो, जेपी दत्ता के साथ भी यही हो रहा है. वे भारत-पाकिस्तान युध पर आधारित एक और फिल्म बनाना चाहते हैं, लेकिन इस बार उनकी फिल्म में 28 तो दूर, एक भी बड़ा सितारा काम करने को तैयार नहीं है. कुछ समय पहले उन्होंने नए कलाकारों को लेकर फिल्म बनाने की घोषणा की, लेकिन कोई भी पफायनेंसर निवेश करने को ही तैयार नहीं हुआ. थक-हारकर जेपी दत्ता ने उस फिल्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया है और अब वक्त बदलने का इंतजार कर रहे हैं. वैसे, इंडस्ट्री के चलन को देखते हुए यह लगता नहीं कि जेपी दत्ता का वक्त कभी बदल पाएगा.
नब्बे के दशक में दीवाना, लाडला, जुदाई, दाग जैसी हिट फिल्में देने वाले राजंकवर को भी इन दिनों ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ रहा है. नब्बे के दशक में राजंकवर ने बतौर निर्देशक शाहरूख खान के साथ दीवाना जैसी सुपरहीट फिल्म दी थी. उस वक्त जेपी दत्ता और वासु भगनानी की तरह ही राजकंवर के सितारे भी बुलंदी पर थे और इंडस्ट्री का हर बड़ा अभिनेता उनके साथ काम करना चाहता था.
लेकिन अब मल्टीप्लेक्स संस्कृति के दौर में राजकंवर की किस्मत भी उनसे रूठ गई है. इंडस्ट्री का कोई बड़ा सितारा तो अब उनके साथ काम करता नहीं, इसलिए नए कलाकारों को लेकर इस साल उन्होंने एक फिल्म बनाई सदियां. लेकिन उनकी इस फिल्म ने भी टिकट खिड़की पर दम तोड़ दिया और इसी के साथ अपने कॅरिअर को फिर से पटरी पर लाने की उनकी आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई.
इंडस्ट्री में वासु भगनानी, जेपी दत्ता और राजंकवर जैसे दर्जनों निर्माता-निर्देशक है. उन्होंने इंडस्ट्री को कईं नए सितारे दिए, कईयों की किस्मत चमकाई. लेकिन अब जब उनकी किस्मत रूठी हुई है, तो उनके साथ कोई नहीं है. चकाचैंध वाले बॉलीवुड की शायद यही सबसे बड़ी सच्चाई है कि यहां बुरे वक्त में कोई साथ नहीं देता है.