13 अगस्त को रिलीज होने जा रही आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म पिपली लाईव इन दिनों विवादों के घेरे में है. विवाद फिल्म के लोकप्रिय हो चुके गाने ‘महंगाई डायन खाय जात है’ को लेकर है. दरअसल, यह गाना मध्यप्रदेश के बदवाई गांव के एक मास्टर गयाप्रसाद प्रजापति का है, जो इसे लंबे समय से एक लोकगीत के रूप में अपने ग्रुप के साथ गाते रहे हैं. प्रजापति साहब से यह गाना फिल्म की निर्देशिका और पत्रकार अनुषा रिजवी ने खरीदा था. लेकिन अब जबकि फिल्म का यह गाना राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है, प्रजापति का आरोप है कि निर्माता-निर्देशकों ने उन्हें मात्र 11,000 रुपए का मेहनताना देकर समझा दिया, जो कि आज के हिसाब से बहुत कम पैसा है.
हालांकि आमिर खान ने प्रजापति सहित उनके सभी साथियों को मुंबई बुलाकर चंद लाख रूपए दे दिए हैं और विवाद को खत्म करने की कोशिश की है. लेकिन सवाल यह है कि हमेशा आमिर के साथ ही ऐसा क्यों होता है ? आखिर, हमेशा फिल्म की रिलीज से पहले आमिर विवादों के बीच कैसे आ जाते हैं. थ्री इडियट्स की रिलीज से पहले उपन्यासकार चेतन भगत ने फिल्म के निर्माता विध्ु विनोद चैपड़ा पर कहानी चुराने का आरोप लगाया था. तब आमिर भी इस विवाद में कूद पड़े थे. खूब बयानबाजी की थी उन्होंने उस वक्त. उसका असर भी हुआ, थ्री इडियट्स भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म साबित हुई. इससे पहले मंगल पांडे की रिलीज के पहले भी ऐसा ही एक विवाद खड़ा हुआ था. आमिर के निर्देशन में बनी फिल्म तारे जमीं पर की रिलीज से पहले भी एक विवाद खड़ा हुआ था, जब आमिर पर अमोल गुप्ते ने आरोप लगाया था कि फिल्म के असली निर्देशक वे हैं और आमिर जबरन का श्रेय ले रहे हैं.
तो आखिर फिल्म की रिलीज से पहले आमिर हमेशा विवादों में क्यों आ जाते हैं ? याद कीजिए, आमिर के बारे में इंडस्ट्री मे कहा जाता है कि वे मिस्टर परफेक्सनीस्ट है, हर कदम सोच समझकर उठाते हैं. कहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि वे अपनी फिल्मों को रिलीज से पहले अच्छा-खासा प्रचार दिलाने के लिए यह सारे फंडे आजमाते हैं. वैसे भी आमिर मार्केटिंग के उस्ताद है. दर्शकों को अपनी पिक्चर की ओर कैसे खींचा जाएं, यह उनकों अच्छे से मालुम हैं. शायद यही वजह है कि आमिर की हर फिल्म रिलीज से पहले एक ऐसे विवाद में पड़ जाती है, जिसके चलते उसे बिना कुछ भी खर्चा किए देश के सभी समाचार पत्रों, टीवी चैनलों में मुप्त प्रचार मिल जाता है.
अगर ऐसा है, तो पिपली लाईव के साथ भी बिल्कुल यही हो रहा है. विवादों के चलते आमिर की यह फिल्म भी रिलीज से पहले हीे हिट नजर आ रही है. सही हो या गलत, आमिर का दांव हमेशा की तरह ही इस बार भी सही साबित हो रहा है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आमिर जैसे श्रेष्ठ अभिनेता को ऐसे प्रचार की जरूरत है, जिनकी फिल्म को देखने के लिए दर्शक वैसे ही सिनेमाघरों की ओर दौड़े चले आते हैं.
Wednesday, July 14, 2010
फिल्मकार, जो भुला दिए गए

बॉलीवुड में एक पुरानी कहावत है ः जो दिखता है, वो बिकता है. और जो नहीं दिखता, मतलब जो बिकाऊ नहीं रह जाता है, उसे रातों-रात भुला दिया जाता है. इस चमक-धमक में बने रहना खासा मुश्किल है और जो वक्त के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते हैं, वे धीरे-धीरे इस चकाचैंध की दुनिया से ओझल हो जाते हैं. बॉलीवुड से जुड़े सभी लोगों के साथ यही होता है फिर चाहे वे निर्देशक हो, निर्माता हो या हीरो-हिरोईन. सभी को इंडस्ट्री में टिके रहने के लिए हर दिन जूझना पड़ता है और जो संघर्ष नहीं कर पाता है उसे इस ग्लैमरस दुनिया से बाहर फेंक दिया जाता है.
सबसे पहले बात करते हैं, उन निर्माता-निर्देशकों की जो कुछ अरसा पहले तक बॉलीवुड के आकाश में चमकते सितारे थे, लेकिन आज पूरी तरह ओझल हो चुके हैं. सबसे पहले ध्यान आता है, नब्बे के दशक के शीर्ष निर्माता वासु भगनानी का. नब्बे के दशक के उस दौर में गोविंदा की कॉमेडी फिल्मों की तूती बोला करती थी और निर्देशक डेविड धवन उस समय के सबसे बिकाऊ और सफलता की सौ फीसदी गारंटी देने वाले निर्देशक हुआ करते थे. वासु भगनानी ने इन्हीं दो के साथ मिलकर कईं ब्लॉकबस्टर फिल्में दी. नब्बे के दशक में इस तिकड़ी ने इंडस्ट्री को कुली नम्बर वन, बड़े मियां छोटे मियां, बीवी नम्बर वन जैसी कामयाब फिल्में दी. बतौर निर्माता वासु भगनानी ने अन्य सितारों के साथ भी बीवी नम्बर वन, मुझे कुछ कहना है जैसी कामयाब फिल्में देकर इंडस्ट्री के नम्बर वन निर्माता का तमगा भी हासिल कर लिया था. लेकिन दर्शकों के फिल्मों का टेस्ट बदलने के साथ ही गोविंदा और डेविड धवन भी नकार दिए गए तो वासु भगनानी का धंधा भी चैपट हो गया. पिछले पांच साल में उन्होंने कोई कामयाब फिल्म नहीं दी है. पिछले साल ही उनकी कल किसने देखा और डू नॉट डिस्टर्ब जैसी फिल्में टिकट खिड़की पर औध्ेंा मूंह गिर गई. कामयाबी उनसे दूर है, तो इंडस्ट्री के बिकाऊ सितारों ने भी उनसे दूरियां बना ली है. अपने बेटे जैकी को उन्होंने कल किसने देखा में लांच किया, तो इस फिल्म में मेहमान भूमिका करने से भी इंडस्ट्री के कई बड़े सितारों ने मना कर दिया. फिल्म जैसे-तैसे रिलीज हुई और किसी बड़े सितारें के न होने से पिट गई. अब तो वासु भगनानी को सितारो के पीछे भागना पड़ रहा है. नब्बे के दशक का यह हिट निर्माता अपने बेटे जैकी को लेकर अब एक और फिल्म बनाना चाहता है, ताकि बेटे का कॅरिअर पटरी पर आ जाए. इस बार भी फिल्म में मेहमान भूमिका के लिए भगनानी ने अक्षय कुमार से बात की, लेकिन खिलाड़ी कुमार ने उनकी नाकामी को देखते हुए साफ इंकार कर दिया. इसके बाद यह लगभग तय हो गया है कि नब्बे के दशक का निर्माता नम्बर वन अब गुमनामी के अंधेंरे में खो जाएगा.
कुछ ऐसा ही हाल जेपी दत्ता का भी है. जेपी दत्ता, यानी वह निर्देशक जिसने बार्डर, रिफ्रयूजी जैसी फिल्में बनाई है. कारगील एलओसी नामक फिल्म में तो उन्होंने इंडस्ट्री के 28 से भी ज्यादा छोटे-बड़े नायकों को काम करने के लिए मना लिया था. जेपी दत्ता की उस फिल्म में मानों पूरी इंडस्ट्री ही इकट्ठा हो गई थी. तब जेपी दत्ता की फिल्म इंडस्ट्री में तूती बोलती थी. लेकिन अब हालात उनके लिए भी बदल गए हैं. दत्ता की पिछली फिल्म उमराव जान टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिरी थी. और इंडस्ट्री का रिवाज है कि यहां टिकट खिड़की पर नाकाम साबित हुए लोगों को कोई नहीं पूछता. सो, जेपी दत्ता के साथ भी यही हो रहा है. वे भारत-पाकिस्तान युध पर आधारित एक और फिल्म बनाना चाहते हैं, लेकिन इस बार उनकी फिल्म में 28 तो दूर, एक भी बड़ा सितारा काम करने को तैयार नहीं है. कुछ समय पहले उन्होंने नए कलाकारों को लेकर फिल्म बनाने की घोषणा की, लेकिन कोई भी पफायनेंसर निवेश करने को ही तैयार नहीं हुआ. थक-हारकर जेपी दत्ता ने उस फिल्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया है और अब वक्त बदलने का इंतजार कर रहे हैं. वैसे, इंडस्ट्री के चलन को देखते हुए यह लगता नहीं कि जेपी दत्ता का वक्त कभी बदल पाएगा.
नब्बे के दशक में दीवाना, लाडला, जुदाई, दाग जैसी हिट फिल्में देने वाले राजंकवर को भी इन दिनों ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ रहा है. नब्बे के दशक में राजंकवर ने बतौर निर्देशक शाहरूख खान के साथ दीवाना जैसी सुपरहीट फिल्म दी थी. उस वक्त जेपी दत्ता और वासु भगनानी की तरह ही राजकंवर के सितारे भी बुलंदी पर थे और इंडस्ट्री का हर बड़ा अभिनेता उनके साथ काम करना चाहता था.
लेकिन अब मल्टीप्लेक्स संस्कृति के दौर में राजकंवर की किस्मत भी उनसे रूठ गई है. इंडस्ट्री का कोई बड़ा सितारा तो अब उनके साथ काम करता नहीं, इसलिए नए कलाकारों को लेकर इस साल उन्होंने एक फिल्म बनाई सदियां. लेकिन उनकी इस फिल्म ने भी टिकट खिड़की पर दम तोड़ दिया और इसी के साथ अपने कॅरिअर को फिर से पटरी पर लाने की उनकी आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई.
इंडस्ट्री में वासु भगनानी, जेपी दत्ता और राजंकवर जैसे दर्जनों निर्माता-निर्देशक है. उन्होंने इंडस्ट्री को कईं नए सितारे दिए, कईयों की किस्मत चमकाई. लेकिन अब जब उनकी किस्मत रूठी हुई है, तो उनके साथ कोई नहीं है. चकाचैंध वाले बॉलीवुड की शायद यही सबसे बड़ी सच्चाई है कि यहां बुरे वक्त में कोई साथ नहीं देता है.
Tuesday, July 13, 2010
छह महीनें, छह हिट

2010 की पहली छमाही में बॉलीवुड की सौ से भीे ज्यादा फिल्में टिकट खिड़की पर औंध्ंेा मूहं गिर गई. इसके बावजूद हर महीनें इंडस्ट्री कम से कम एक हिट फिल्म देने में कामयाब रही,, जिसने दूसरी फिल्मों की नाकामी के दर्द को कुछ हद तक कम कर दिया. तो, आईए जानते हैं कि साल की पहली छमाही में कौन सी फिल्में टिकट खिड़की पर पैसा कमाने में कामयाब रही ः
जनवरी - इश्कियां ः इस फिल्म के साथ विशाल भारद्वाज का नाम जुड़ा हुआ था. पिक्चर उनके चेले और ओमकारा, मकड़ी जैसी फिल्में लिख चुके अभिषेक चैबे ने बनाई थी. पिक्चर बोल्ड थी,, तो विद्या बालन की अदाएं कातिल, सो फिल्म साल की पहली हिट साबित हुई. अरशद वारसी और नसीरूद्दीन शाह का अभिनय तो कमाल था ही पिक्चर में.
फरवरी-माय नेम इज खान ः शाहरूख-करण जौहर-काजोल की तिकड़ी का जादू आखिरी बार कभी खुशी कभी गम में देखने को मिला था. इस फिल्म ने इस जुगलबंदी की यादें फिर ताजा कर दी. पिक्चर की कहानी इस बार रोमांटिक नहीं,, बल्कि आतंकवाद पर थी. फिर भी, इस तिकड़ी के जादू और कुछ शिवसेना से जुड़े विवाद की मेहरबानी के चलते फिल्म हिट हो गई.
मार्च-लव सेक्स और धोखा ः एकता कपूर छोटे परदे पर भले ही बोर करने वाले और दकियानुसी सास-बहू के सीरियल बनाती हैं, लेकिन इस फिल्म में उन्होंने गजब का साहस दिखाया. निर्देशक के तौर पर उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके दीबाकर बनर्जी को चुना. सबसे बड़ी खासियत फिल्म का बोल्ड विषय था-इंसानी जिंदगी में कैमरे का दखल. इन्हीं खूबियों के चलते फिल्म इस साल की स्लीपर हिट साबित हुई.
अप्रैल-हाउसपफुल ः साजिद खान चतुर निर्देशक है, हॉलीवुड के सारे मसाले चुराकर आध दर्जन सितारों के साथ एक मनोरंजक फिल्म बनाते हैं. हाउसपफुल में भी उन्होंने वहीं किया. अक्षय कुमार, रितेश देशमुख, लारा दत्ता, दीपिका पादुकोण पूरी पिक्चर में हंसाते रहते हैं. फिल्म हिट हुई और साठ करोड़ की कमाई कर डाली.
मई- बदमाश कंपनी ः वैसे आजकल यशराज कैम्प की फिल्में कम ही कामयाब होती है, लेकिन अच्छी कहानी, चुस्त पटकथा और शाहिद कपूर, अनुष्का शर्मा सहित सभी कलाकारों के उम्दा अभिनय के चलते फिल्म हिट रही. नए निर्देशक परमीत सेठी ने चार दोस्तों के करोड़पति बनने के ख्वाबों को बंटी और बबली के अंदाज में दिखाया, जिसे दर्शकों ने भी पसंद किया.
जून- राजनीति ः प्रकाश झा की यह पिक्चर महाभारत का आध्ुनिक संस्करण थी. स्टार कास्ट ऐसी की बस पढ़ते जाइए-नाना पाटेकर, अजय देवगन, मनोज बाजपेयी, कैटरीना कैपफ, नसीरूद्दीन शाह वगैरह-वगैरह. खैर, गंभीर कहानी के बावजूद पिफल्म हिट साबित हुई. हिट भी इतनी बड़ी कि थ्री इडियट्स और गजनी के बाद भारतीय सिनेमा इतिहास की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई.
Friday, July 9, 2010
फिल्में नई, गीत पुराने

आजकल टीवी के म्यूजिक चैनलों पर अजय देवगन-इमरान हाषमी अभिनीत फिल्म वन्स अपाॅन ए टाईम इन मुंबई के प्रोमो चल रहे हैं. यह पिक्चर 30 जुलाई को रिलीज होने वाली है, लेकिन इसके प्रोमो में दिखाया जा रहा एक गाना अभी से दर्षकों के दिलों को लुभा रहा है: पर्दा........पर्दा...... असल में यह गीत सत्तर के दषक के चार्टबस्टर्स गानों- दुनिया में लोगों को धोखा हो जाता है और मोनिका...ओ माय डार्लिंग- से प्रेरित है. पिक्चर में भी सत्तर के दषक में मुंबई में पनप आए अंडरवल्र्ड की कहानी को दिखाया गया है , इसलिए यह गाना एकदिम मुफीद बैठता है. सत्तर के दषक में इन गानों ने खूब धूम मचाई थी, और आज भी यह गाने संगीत की दुनिया में क्लासिक के तौर पर दर्ज हैं.
वैसे, बात यहां यह हो रही है कि नई फिल्मों में पुराने गीतों, या उनके मुखड़ो या फिर उनकी धुनों का इस्तेमाल आजकल बाॅलीवुड के लिए आम बात होती जा रही है. याद कीजिए पिछले साल आई सैफअली खान और दीपिका पादुकोण की ब्लाॅकबस्टर फिल्म लव आजकल को, जिसमें नागिन फिल्म की प्रसिध धून को ‘ट्वीस्ट...ओनली ट्वीस्ट’ गाने में नए अंदाज में पेष किया गया था. तब बिन की धून पर नायिकाएं थिरकी थी,, इस फिल्म में सैफ अली खान अपने खास अंदाज में इस धून पर थिरकते नजर आए. अभी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म हाउसफुल में भी अक्षय कुमार, अर्जुन रामपाल और रितेष देषमुख लावारिस फिल्म के सदाबहार गीत अपनी तो जैसे-तैसे कट जाएगी, आपका क्या होगा...जनाबेआली. पर नाचते दिखाई दिए.
बात यह है कि आजकल नए दौर के संगीतकारांे को पुरानी धुनें जरा ज्यादा ही भाने लगी है. या इसे यूं भी कह लीजिए कि बेचारों के पास कल्पनाषीलता का अकाल है. नई और ओरिजनल धूनें वे रच नहीं पाते. लेकिन करें भी क्यां, क्योंकि निर्माता से धुने बनाने के लिए पैसा तो ले लिया है. सो, पुरानी क्लासिक फिल्मों की डीवीडी उठाते हैं और कोई अच्छी सी धुन को नए सिरे से ढालकर निर्माता के सामने रख देते हैं. अब पचास तरह के झमेलों से जूझ रहे निर्माता के पास तो इतना वक्त नहीं कि वह असली-नकली का फर्क कर लें, सो वह अपनी रजामंदी दे देता है. रही बात निर्देषक की,, तो उसने तो फिल्म की कहानी ही चुराई हुई होती है, सो वह तो संगीतकार के काम में मिनमेख निकालने से रहा. सो, वह भी क्लासिक और सदाबहार का हवाला देकर पुराने गीतों या धुनों को नए सिरे से अपनी पिक्चर में शामिल करने के लिए तैयार हो जाता है. तो, इस तरह एक पुराना गाना एकदम नई फिल्म के जरिए दर्षकों के सामने एक बार फिर पहुुंच जाता है.
इंडस्ट्री में आजकल यही हो रहा है. हिमेष रेषमिया, प्रितम, आदेष श्रीवास्तव जैसे दर्जनों संगीतकार हैं यहां, जो नई धुनों को रचने की जहमत नहीं उठाते, बल्कि पुरानी धुनों को ही नए सिरे से सजा-संवार देते हैं. आखिरकार, प्रेरणा भी तो कोई चीज होती है भाई और प्रेरणा तो कहीं से भी ली जा सकती है...!
फिल्म समीक्षा: रेड अलर्ट

बाॅलीवुड में आमतौर पर भीरू-मतलब डरपोक- लोग होते हैं, सो किसी भी फिल्म की शुरूआत से पहले ही बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया जाता है-इस फिल्म के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक है और इनका किसी व्यक्ति, या घटना से कोई संबंध नहीं है. सो, सुनील शेट्टी,, समीरा रेड्डी,, भाग्यश्री,, विनोद खन्ना जैसे सितारों से सजी फिल्म देखने जाने पर फिल्म चालू होने के दो मिनट बाद ही इसके निर्माता टीपी अग्रवाल और निर्देषक को शाबासी देने का मन करता है. वजह, दोनों बंदों ने पूरी ईमानदारी बरतते हुए और इससे भी बढ़कर हिम्मत दिखाते हुए फिल्म में लिख दिया है: यह फिल्म वास्तविक घटना पर आधारित है.
सो, पहले दो मिनट में निर्देषक अनंत महादेवन को शाबासी दे दी,, तो फिर पूरी फिल्म में भी बस पिक्चर देखते जाइए और उनको शाबासी देते जाइए. मतलब यह कि यह फिल्म कमाल की है. या फिर यह कहें कि आंखें खोल देने वाली है. यह फिल्म आपको हंसाती नहीं है, गुदगुदाती नहीं है, आपके दिमाग में कई सवाल छोड़ जाती है. दिल पर प्रहार करती है और आंखों को मजबूर करती है कि आप बिना ईधर-उधर ध्यान भटकाएं बस सिनेमाघर के पर्दे पर ही आंख टिकाएं रहे.
वैसे, ईमानदारी की बात यह है कि फिल्म की कहानी ऐसी है, जो आजकल हर दूसरे दिन अखबारों में पढ़ने को मिल जाती है या टीवी चैनलों पर देखने को मिल जाती है. मुद्दा नक्सलवाद का है , जो इन दिनों देष का सबसे बड़़ा मुद्दा बना हुआ है. तो फिर, तारीफ कीजिए आप फिल्म की लेखिका अरूणा राजे की,, जिन्होंने कई बार सुनी और देखी गई इस कहानी को भी अद्भूत बना दिया है. जी हां, अद्भूत, क्योंकि नक्स्लवाद के बारे मे आपने भले हीे अखबारों और टीवी चैनलों की मेहरबानी से पीएचडी कर मारी हो, फिर भी यह फिल्म आपके सामने नक्सलवाद की एक नई दुनिया सामने लाती है. कहानी वहीं है कि एक आम, गरीब आदमी नक्सल आंदोलन और कानून व्यवस्था के बीच फंस जाता है और दोनों तरफ से बचना ही अब उसकी नियति है.
कहानी अगर आपको चैकाती है, तो इसके कलाकार तो बस आपके दिमाग पर छा ही जाते हैं. असल में, ये आपके दिमाग में हलचल पैदा करते है, बैचेनी पैदा करते हैं, सवाल पैदा करते हैं. सुनील शेट्टी,, यह कलाकार अभी तक भले ही मारधाड़ की बेहूदा फिल्में करता रहा, लेकिन रेड अलर्ट में उसने वह अभिनय किया है, जिसकी मिसाल शायद ही दी जा सके. पिछले देढ़ दषक से ज्यादा के कॅरिअर में सैकड़ों खलनायकों को पीटपीट कर अधमरा कर देने वाले सुनील को इस फिल्म में एक लाचार और विकल्पहीन आदमी की भूमिका निभानी थी. आष्चर्य यह कि हट्टे-कट्टे सुनील शेट्टी ने यह कर दिखाया. जब उसके चेहरे पर हताषा आती है, तो वह असली लगती है. जब वह डरता है, तो वह डर असली लगता है. यकीनन, यह सुनील शेट्टी के कॅरिअर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है. यही बात समीरा रेड्डी के लिए भी कह सकते हैं. ग्लैमरस भूमिकाओं में खाली भर्ती लगने वाली समीरा एक गंभीर और नानॅ ग्लेमर रोल में बस कहर ढाती है. इस फिल्म के बाद दर्षकों को पता चल जाएगा कि आखिर कोलकाता के दिग्गज फिल्मकार समीरा को अपनी फिल्मो में क्यों लेते रहे हैं. यही बात विनोद खन्ना, भाग्यश्री,, आषीष विद्यार्थी सभी के लिए कही जा सकती है. सभी का अभिनय ऐसा स्वाभाविक है कि बस देखते जाओं.
अब बात निर्देषक अनंत महादेवन की. पिछले कुछ सालों में उन्होंने दर्जनभर बेहूदा मसाला फिल्में बनाई है, लेकिन इसकी भरपाई यह एक फिल्म बनाकर ही कर दी. उनके लिए सलाह यह कि वे आगे भी ऐसी ही फिल्में बनाते रहे, तो फिर कोई शायद ही बाॅलीवुड पर मसाला फिल्मों वाला सिनेमा कहने का आरोप लगाए.
आखिर में- यह फिल्म आपको देखना चाहिए. अगर आप आई हेट लव स्टोरीज जैसी प्यार-गाने, रूठने-मनाने वाली फिल्म देखने में अपना पैसा खर्चते हैं, तो फिर यह फिल्म देखना आपका कर्तव्य है. अगर आप सार्थक और देष की गंभीर समस्याओं को लेकर जरा भी संवेदनषील हैं, तो बस इस फिल्म को देखने आपके नजदीकी सिनेमाघर चले जाइए...
Thursday, July 8, 2010
बनती फिल्में, बिगड़ती फिल्में !

इस सप्ताह रिलीज होने जा रही फिल्म मिलेंगे-मिलेंगे से जुड़ी एक दिलचस्प खबर, जो हमें यह बताती है कि बाॅलीवुड में कई फिल्में बड़े सितारे, दिग्गज निर्माता कंपनी के बावजूद किस तरह कई सालों तक रिलीज को तरसती रहती है. शाहिद कपूर और करीना कपूर की यह फिल्म, जो 9 जुलाई 2010 को रिलीज हो रही है , 2004 में बनना शुरू हुई थी. तब फिल्म के नायक-नायिका एक दूसरे के प्यार में गिरप्तार थे, इसलिए उन्होंने फिल्म निर्माता बोनी कपूर को एकमुष्त तारीखें दे डाली. दिल्ली, दुबई और थाइलेंड की खूबसूरत लोकेषनों पर फिल्म की शूटिंग हुई और चंद महीनों के भीतर ही शूटिंग लगभग पूरी हो गई. मतलब यह कि सिर्फ पोस्ट-प्रोडक्षन का कामकाज बाकी था. फिल्म के निर्माता बोनी कपूर खूष थे और 23 दिसंबर 2005 को फिल्म रिलीज करने की योजना भी बना ली गई. तभी फिल्म को किसी की नजर लग गई. निर्माता की आर्थिक परेषानियों के चलते फिल्म तय तारीख पर रिलीज नहीं हो पाई. इसके बाद जब बोनी कपूर की आर्थिक दिक्कतें खत्म हुई, तो उन्होंने वापस फिल्म पर ध्यान लगाया. बोनी कपूर जल्द से जल्द फिल्म का पोस्ट-प्रोडक्षन निपटाकर इसे रिलीज कर देना चाहते थे.
लेकिन अफसोस कि तब तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी. असल जिंदगी में प्यार के गीत गाने वाले शाहिद-करीना के बीच अलगाव हो चुका था और यह अलगाव फिल्मी नहीं था. मतलब यह कि शाहिद का साथ छोड़कर करीना ने हमेषा के लिए नए प्रेमी सैफ अली खान को अपना लिया था. सो, पहले एक साल बोनी कपूर लाख कोषिषों के बावजूद शाहिद करीना को फिल्म का पेंचवर्क निपटाने के लिए मना नहीं पाए. खैर, वक्त बीतने के साथ भूतपूर्व प्रेमियों के जख्म भरे, तो वे फिल्म को पूरा करने के लिए तैयार हो गए. फिर भी उनकी एक शर्त थी-वे फिल्म के प्रमोषन के लिए साथ नजर नहीं आने वाले थे और आए भी नहीं. फिल्म के प्रमोषन के लिए एक गीत भी दोनों पर अलग-अलग फिल्माया गया. खैर, यह भी हो गया जैसे-तैसे.
तो, अब छह साल बाद जैसे-तैसे करके बोनी कपूर इस फिल्म को रिलीज कर रहे हैं. 9 जुलाई को फिल्म रिलीज हो रही है और उम्मीद है कि कुछ अच्छा भी कर गुजरेगी टिकट खिड़की. पर.
पर सवाल फिल्म के ठंडे बस्ते में जाने को लेकर हैं. बोनी कपूर कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं है, बल्कि बाॅलीवुड में उनके परिवार को बड़े सम्मान से देखा जाता है. बोनी के पिता सुरिंदर कपूर के जमाने से इस घराने की साख बनी हुई है और अनिल, संजय कपूर के साथ मिलकर बोनी ने निर्माता पिता की ख्याति बढ़ाई ही है. बावजूद इसके एक फिल्म को पूरा करने में बोनी को छह साल लग गए. बोनी कपूर की यह हालत है, तो इंडस्ट्री के छोटे-मोटे निर्माताओं की हालत समझी जा सकती है.
दरअसल, कड़वा सच यह है कि साल में बाॅलीवुड की जितनी फिल्में रिलीज होती है, उससे आधी तो मुहूर्त शाॅट के बाद ही डिब्बे में चली जाती है. कई फिल्मों का मूहूर्त भी होता है, कुछ रिलों तक शूटिंग भी होती है, फिर मामला गड़बड़ा जाता है. चलो, फिल्म पूरी भी हो गई जैसे-तैसे, तो अब रिलीज को लेकर कई दिक्कतें. फिल्म में बिकाउ सितारें नहीं हैं, तो उसे बेचने में निर्माता की जिंदगी हराम हो जाती है. चलों, जैसे-तैेसे फिल्म कई सालों के झटकों के बाद रिलीज भी हो गई ,तो अब वह तो बिचारी पुरानी चीज हो गई है, सो दर्षक उससे दूर ही रहते हैं. आलोचक भी सिरे से खारिज कर देते हैं ऐसी फिल्मों को आउटडेटेड बताकर, और निर्माता बेचारा सिर पिटकर घर बैठ जाता है.
बाॅलीवुड में यह किस्से आम है. लगभग सभी शीर्ष सितारों की कई फिल्में लंबे समय से डिब्बे में बंद है. अक्षय कुमार की ही बात करें, तो बोनी कपूर की पत्नी श्रीदेवी के साथ बरसों पहले इन्होंने एक फिल्म की थी-मेरी बीवी का जवाब नहीं. फिल्म बनती रही,, बनती रही, बस बनती रही, और बरसों बाद 2004 में जाकर रिलीज हुई. तब तक श्रीदेवी का मार्केट खत्म हो चुका था और अक्षय खिलाड़ी कुमार का मार्केट जमा नहीं था, सो फिल्म कब आई, कब गई किसी को पता ही नहीं चला. शाहरूख खान की फिल्म दूल्हा मिल गया भी बरसों से बन रही थी और पिछले साल जैसे-तैसे रिलीज हुई , लेकिन नतीजा वहीं ढाक के तीन पात. सुनील शेट्टी ने बरसों पहले ऐष्वर्या राय के साथ दो फिल्में साईन की थी-हम पंछी एक डाल के और राधेष्याम-सीताराम-लेकिन दोनों ही फिल्में आज तक रिलीज नहीं हो पाई. राधेष्याम-सीाताराम के निर्देषक अनीज बज्मी थे, जो इसक बाद नो एंट्री, वेलकम जैसी दर्जनों हिट फिल्में बना चुके हैं, लेकिन राधेष्याम-सीताराम आजतक रिलीज नहीं हो पाई. अब बात आज के दौर के दिग्गज फिल्मकारों में गिने जाने वाले अनुराग कष्यप् की. बंदे ने पहली फिल्म लिखी-सत्या. फिल्म गजब की थी, कष्यप भी रातोंरात स्टार बन गए, लेखक होने के बावजूद. लेकिन इसके बाद उन्होंने ब्लेक Úाइडे बनाई, जो कई साल बाद रिलीज हुई. एक और पिक्चर बनाई उन्होंने पांच जो आजतक रिलीज नहीं हुई. इस फिल्म के साथ प्रेमरोग वाली पदमिनी कोल्हापूरे की बहन तेजस्वीनी अपने कॅरिअर की शुरूआत की थी, लेकिन बेचारी की पूरी जवानी इस फिल्म की रिलीज का इंतजार करते ही गुजर गई, बावजूद इसके कि इस फिल्म के निर्माता उनके जीजाजी ही थे यानी कि पद्मिनी के पति टूटू शर्मा.
तो, जनाब, इंडस्ट्री में हजारों ऐसी फिल्में है, जिनकी यही दषा होती है. वे शुरू तो होती है, लेकिन कभी पूरी नहीं हो पाती. पूरी भी हो जाती है, तो रिलीज नहीं हो पाती. रिलीज भी हो गई, तो कमा नहीं पाती क्योंकि तब तक बासी चीज हो जाती है. आखिर ऐसा ही थोड़े कहा जाता है कि उजली दिखने वाली इंडस्ट्री के पीछे घनघोर अंधेरा है.
Wednesday, July 7, 2010
बाॅलीवुड और फुटबाॅल

बाॅलीवुड सितारों का खेल के प्रति लगाव किसी से छुपा हुआ नहीं है. इसी का नतीजा है कि शाहरूख खान, प्रिटी जिंटा और षिल्पा शेट्टी जैसे बड़े फिल्मी सितारे आईपीएल में टीमें खरीदे हुए हैं. लेकिन चूंकि अभी फुटबाॅल की खूमारी छाई हुई है, सो इन सितारों ने भी अपना पसंदीदा खेल बदल लिया है. जी हां, क्रिकेट को किनारे रखते हुए इन दिनों फुटबाॅल इन सितारों का पसंदीदा खेल बना हुआ है.
तो फिर बाॅलीवुड में फुटबाॅल के सबसे बड़े दिवाने कौन है ? तो, इस सूची में सबसे पहला नाम आता है जाॅन अब्राहम का. जी हां, जाॅन को क्रिकेट में तो ज्यादा दिलचस्पी नहीं है, लेकिन फुटबाॅल का खेल उन्हें खूब भाता है. फुटबाॅल को लेकर जाॅन की दीवानगी का आलम यह है कि वे अपनी फिल्मों की शूटिंग को आगे खिसकाकर हाल-फिलहाल फुटबाॅल का विष्वकप देखने के लिए दक्षिण अÚीका में डेरा जमाए हुए हैं. याद कीजिए, जाॅन ने फुटबाॅल पर आधारित एक फिल्म अभिनय भी किया था. इस फिल्म का नाम था-दे दना दन गोल फिल्म में जाॅन को जिस टीम के लिए खेलते दिखाया गया था, वह इंग्लिष फुटबाॅल क्लब मैनचेस्टर यूनाइटेड से प्रेरित थी. आमतौर पर खेल पर आधारित फिल्में बनाने से परहेज करने वाले बाॅलीवुड के इतिहास में इस फिल्म को खास जगह मिली है, भले ही फिल्म टिकट खिड़की पर ज्यादा कमाई करने मे कामयाब नहीं रही थी.
जाॅन के साथ ही शाहरूख खान भी फुटबाॅल के बेहद दिवाने हैं. किंग खान की दीवानगी का आलम यह है कि जाॅन की तरह वे भी दक्षिण अÚीका जाकर फाइनल मुकाबलें का लुत्फ उठाने की योजना बना रहे हैं. शाहरूख की इस दीवानगी में उनका पुत्र आर्यन भी शामिल है, सो किंग खान परिवार के साथ 11 जुलाई को फुटबाॅल के विष्वकप का लुत्फ उठाते नजर आए, तो आष्चर्य नहीं होना चाहिए.
वैसे, ये सितारे भले ही फुटबाॅल को लेकर दीवानगी दिखा रहे हो, लेकिन बाॅलीवुड ने अभी भी इस खेल पर आधारित कोई क्लासिकल फिल्म नहीं बनाई है. उम्मीद है 2010 के विष्वकप के बाद इन सितारों में से कोई एक हाॅलीवुड के टक्कर की फुटबाॅल आधारित फिल्म बनाएगा. तब तक, अपने पसंदीदा सितारों को फुटबाॅल का मजा लेने के लिए छोड़ दीजिए.
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