Saturday, July 3, 2010

महान नहीं है ‘खान’


पिछले दिनों बाॅलीवुड के फिल्मकारों के बीच इस बात को लेकर बहसबाजी का दौर शुरू हो गया कि आखिर इस साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कौन सी है. इस मामलें में सबसे पहले अपनी दावेदारी साजिद खान ने प्रस्तुत की और कह दिया कि चूंकि उनकी फिल्म हाउसफुल इस साल टिकट खिड़की पर सबसे ज्यादा कमाई की है, इसलिए वहीं सबसे कामयाब है. लेकिन साजिद खान की इस बात का करण जौहर ने सिरे से विरोध किया और यह बयान दे डाला कि चूंकि उनकी फिल्म माई नेम इज खान आतंकवाद जैसे वैष्विक मुद्दें पर आधारित थी, इसलिए वहीं इस साल की सबसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म है. यही नहीं,, जौहर ने तो यहां तक कह दिया कि उनकी फिल्म भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे महान फिल्मों में शुमार होनी चाहिए, क्योंकि यह एक गंभीर विषय पर बनी उम्दा फिल्म है.
ऐसे में, बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सही मायनों में ‘माई नेम इज खान’ बाॅलीवुड की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक फिल्म है। बाॅलीवुड को कई महान फिल्में देने वाले गुलजार साहब की वह बात, जो उन्होंने तीन साल पहले कहीं थी, की बात महान फिल्मों के संदर्भ में हमेशा सारगर्भित रहेगी. अपनी फिल्मों का जिक्र छिड़ने पर गुलजार साहब ने बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा था कि मेरी फिल्में महान है, यह बात सही है, लेकिन मुझे इस बात की संतुष्टि है कि मेरी फिल्म ने उस दर्षकों को भी उसके पैसे की पूरी कीमत वसुल कराई, जो उसने सिनेमाघर में मेरीे फिल्म देखने में खर्च किया। गुलजार साहब का कहना यह था कि उनकी फिल्में संदेषपरक तो थी ही, साथ ही मनोरंजक भी थी। आखिर में उन्होंने यही कहा था कि किसी भी फिल्म को सबसे पहले मनोरंजक होना चाहिए, उसके बाद संदेषपरक।
शाहरूख की ‘माई नेम इज खान’ को इसी कसौटी पर तौले तो साफ हो जाता है कि ‘खान’ देष-दुनिया में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म भले ही बन जाए, लेकिन यह सबसे महान भारतीय फिल्म नहीं बन सकती। यह ‘थ्री इडियट, शोले, दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे, गजनी के बराबर महान नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि शाहरूख की ‘माई नेम इज खान’ तमाम खूबियों के बावजूद एक मनोरंजक फिल्म नहीं है। यह दर्शकों को उस तरह हंसाती, या अपने साथ नहीं जोड़ती, जिस तरह थ्री इडियट और शोले जोड़ती है। फिल्म एक ऐसे मुसलमान रिजवान की कहानी कहती है, जो खुद को आतंकवादी बिरादरी से अलग साबित करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति से मिलने की असंभव कोषिष करता है और उसमें कामयाब भी होता है। लेकिन यकीन कीजिए उसकी यह कोषिष बिल्कुल भी मनोरंजक नहीं है। बाॅलीवुड के प्रख्यात आलोचक कोमल नाहटा ने मुझसे सही कहा कि यह फिल्म शुरू से आखिर तक एक ही ढर्रे पर चलती है। न तो इसमें शाहरूख और काजोल के बीच रोमांस का तड़का अच्छे से लगा है और न ही हंसाने वाले दृष्य बहुत ज्यादा हैं। इसके साथ ही फिल्म की सबसे बड़ी कमी यह है कि एक वक्त के बाद रिजवान का अमेरिकी राष्ट्रपति तक पहुंचने का सफर दर्षकों को बोझिल लगने लगता है। इसी के चलते दर्षक आखिर कुछ रीलों में यह दुआ करता नजर आता है कि शाहरूख जल्द से जल्द राष्ट्रपति से मिल लें, तो वह सिनेमाघर से बाहर निकले।
जाहिर है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि फिर शाहरूख की ‘माई नेम इज खान’ इतनी कमाई करने में कामयाब कैसे हुई? आखिर कैसे इसने भारत में ही नहीं, पाकिस्तान, अमेरिका और सउदी अरब, सभी जगह कामयाबी के नए कीर्तिमान बना डाले? तो इसका सबसे उपयुक्त जवाब यही होगा कि फिल्म की कामयाबी में उसके साथ जुड़े विवादों ने खास भूमिका निभाई है। याद कीजिए उन दिनों को, जब माई नेम इज खान की 12 फरवरी को रिलीज से ठीक पहले षिवसेना और शाहरूख के बीच विवाद किस तरह सुर्खियां बटोर रहा था। शाहरूख ने आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के बारे में कुछ बोला और बाल ठाकरे ने इसे देष का सबसे चर्चित मुद्दा बना डाला। चूंकि शाहरूख की फिल्म रिलीज होने वाली थी, इसलिए उन्होंने भी इस विवाद को खूब हवा दी। याद कीजिए, किस तरह शाहरूख ने बाल ठाकरे से माफी मांगने से मना कर दिया, दुबई से मुंबई आए और वापस विदेष चले गए। फिर रिलीज वाली तारीख, यानी 12 फरवरी को वे ट्वीटर पर जमंे रहे और वहां हर दूसरे मिनट फिल्म को समर्थन मिलने की बात पर भावुक संदेष भेजते रहे। उन संदेषों को चूंकि भारतीय मीडिया ने भी दिखाया, इसलिए हर हिंदुस्तानी को पता चल गया कि उनका लाडला सितारा बाल ठिकारे के अन्याय के खिलाफ लड़ रहा है. भारतीय जनता वैसे भी जल्दी भावुक हो जाती है, इसलिए वह भी समर्थन दिखाने के लिए सिनेमाघर पहुंच गई। तो, इस तरह फिल्म ने रिकाॅर्डतोड़ कमाई की और भारतीय सिनेमा की सबसे कामयाब फिल्म बन गई।
हालांकि फिल्म मनोरंजक नहीं है, इसका पता उसके दूसरे सप्ताह में कमाई के आंकड़ों से भी लग जाता है। फिल्म की दूसरे सप्ताह की कमाई में 60 फीसदी तक की गिरावट देखी गई. जाहिर है, वे लोग जो शाहरूख-षिवसेना के विवाद के चलते फिल्म देखने चले गए थे, उसे दोबारा देखने नहीं गए. गुलजार साहब के शब्दों मेंः महान फिल्म वहीं होती है, जिसे दर्षक बार-बार देखने जाए। गजनी और थ्री इडियट को लोगों ने कई बार सिनेमाघर जाकर देखा। लेकिन शाहरूख की ‘माई नेम इज खान’ से लोगों ने पहली बार में ही इतिश्री कर ली। इसीलिए मैं कहता हूं कि ‘माई नेम इज खान’ सबसे कामयाब फिल्म भले ही बन गई हो, लेकिन यह बाॅलीवुड की सबसे महान फिल्म नहीं है। इसे सबसे महान फिल्म कहना दूसरी महान फिल्मों की तौहीन होगी।
जहां तक साजिद खान की हाउसफुल का सवाल है, तो उनके दावे पर तो तवज्जो तक नहीं दी जानी चाहिए. साजिद खान एक ऐसे फिल्मकार है, जो फिल्म की कहानी लिखने से पहले आधा दर्जन हाॅलीवुड फिल्मों की सीडी अपने घर में देखते है, फिर सभी में से एक-दो दृष्य चुराकर कहानी लिख देते हैं. साजिद खान के बारे में इससे ज्यादा कहने की जरूरत भी नहीं है.

Friday, July 2, 2010

अगली छमाहीः इन फिल्मो से है उम्मीदें



नाकाम फिल्मों के ढेर पर खड़े बाॅलीवुड के लिए अगली छमाही में कामयाबी हासिल करना बेहद जरूरी है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि 2010 की दूसरी छमाही में ऐसी कौन सी फिल्में रिलीज होने जा रही है, जिनसे बाॅलीवुड अच्छे कारोबार की उम्मीद कर सकता हैः
गोलमाल 3ः रोहित शेट्टी की यह फिल्म टिकट खिड़की पर सफलता की सौ फीसदी गारंटी देती हे. आखिरकार इसकी पहली दा कड़ियों- गोलमाल और गोलमाल रिटन्र्स ने टिकट खिड़की पर सफलता के नए कीर्तिमान बनाए हैं. रोहित अपनी फिल्में दिवाली पर रिलीज करते हैं, यह फिल्म भी दिवाली पर ही रिलीज होगी. तो तैयार हो जाइए अजय देवगन, श्रेयस तलपड़े, अरषद वारसी,, करीना कपूर के साथ एक और दिवाली धमाल के लिए.
लफंगे परिंदेः पिछले तीन सालों में दर्जनभर नाकाम फिल्में देेने के बाद लगता है, अब चैपड़ा कैम्प की रणनीति पूरी तरह से बदल गई ह. स्वीटरजरलंड मे फिल्माई रामांटिक फिल्मों से ध्यान हटाकर अब वे गंभीर मुद्ृदों पर फिल्में बनाने लगे हैं. पिछले साल न्यूयाॅर्क में उन्होंने वैष्विक आतंकवाद दिखाया, तो अब दीपिका पादुकोण-नील नीतिन मुकेष लफंगे परिंदे मारधाड़ वाली फिल्म है.
एक्षन रिप्लेः विपुल ष्ह और अक्षय कुमार की जोड़ी ने नमस्ते लंदन, सिंह इज किंग जैसी हिट फिल्में दी है. इस साल दीवाली पर वे एक्षन रिप्ले लेकर आ रहे है. ऐष्वर्या राय इस फिल्म में अक्षय की नायिका के रूप में दिखाई देंगी,, सो अच्छी फिल्म की उम्मीद की जा सकती है.
गुजारिष:रितिक रोषन इस फिल्म में संजय लीला भंसाली के निर्देषन मंे काम करते दिखाई देंगे. फिल्म में मजबूत मांसपेषियों वाले रितिक इस फिल्म में व्हील चेयर पर दिखाई देंगे. भंसाली की पिछली फिल्म सांवरिया टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिर गई थी,, लेकिन इस बार रितिक के साथ वे पुराना हिसाब बराबर करने की पूरी कोषिष करेंगे. एक और खास बात- ऐष्वर्या राय इस फिल्म में रितिक की हिरोईन होंगी.
तीस मार खानः फरहा खान कभी शाहरूख खान के खेमें में हुआ करती थी,, उन्होंने शाहरूख के साथ ओम शांति ओम और मैं हूं ना जैसी हिट फिल्में भी दी, लेकिन अब वे खेमा बदलती दिखाई दे रही है. शाहरूख के अलावा किसी और के साथ काम न करने की कसमें खाने वाली फरहा दिवाली पर रिलीज होने वाली फिल्म तीस मार खान में अक्षय कुमार को निर्देषित करती दिखाई देंगी. फिल्म में कैटरीना कैफ, अक्षय खन्ना भी नजर आएंगे. सो तैयार हो जाइएं एक और धमाकेदार मनोरंजक फिल्म के लिए.
दबंगः अपने कॅरिअर में सलमान खान पहली बार मूंछो में दिखाई देंगे. जी हां, अपने भाई अरबाज खान की बतौर निर्माता दबंग फिल्म में वे एक भ्रष्ट पुलिसवाले की भूमिका में दिखाई देंगे. सो इस बार आप उनसे शर्ट उतारने की उम्मीद मत कीजिए, हां वांटेड जैसी मारधाड़ खूब रहेगी.
अंजाना-अंजानी: इस साल राजनीति जैसी ब्लाॅकबस्टर फिल्म पहले ही दे चुके रणबीर साल की दूसरी छमाही में अंजाना-अंजानी में प्रियंका चैपड़ा के साथ रोमांटिक गीत गाते नजर आएंगे. फिल्म के निर्देषक सिधार्थ आनंद है, सो एक रोमांटिक फिल्म की उम्मीद सबको है.
इन बड़े बजट और बड़े सितारों की फिल्मों के साथ ही रक्त चरित्र, नाॅक आउट, पटियाला हाउस जैसी फिल्में भी उम्मीद जगाती है. अब देखना यह है कि साल की दूसरी छमाही बाॅलीवुड के लिए शुभ रहती है या नहीं.

क्यों नहीं बनती अब सिल्वर जुबली फिल्में ?



हाउसफुल और राजनीति देष के सभी हिस्सों में अच्छा कारोबार करने में कामयाब हुई, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि इन दोनों ही फिल्मों की कहानी हर वर्ग के दर्षक के लिए थी-मल्टीप्लेक्स के दर्षकों के लिए भी,, ठाठिया सिनेमाघरों के दर्षकों के लिए भी.
2010 की पहली छमाही खत्म हो चुकी है और बाॅलीवुड के हिस्से में अब तक तसल्ली लायक कामयाबी भी नहीं है. छह महीनें में आधा दर्जन से भी कम फिल्मों की कामयाबी के साथ ही 150 से ज्यादा फिल्मों की नाकामी भी साल की पहली छमाही में इंडस्ट्री के साथ जुड़ गई है. टिकट खिड़की कें आंकड़ों पर नजर डाले तो पहली छमाही में-अक्षय कुमार की हाउसफुल, अजय देवगन-रणबीर कपूर की राजनीति ही दो ऐसी फिल्में रही,, जिन्हें अखिल भारतीय कामयाबी मिली. मतलब मात्र ये फिल्में ही पूरे देष में अच्छा कारोबार करने में कामयाब हो पाई.
कमयाबी के इस बेहद कम प्रतिषत की कई वजहें है, जिनमें से एक है निर्माता-निर्देषकांे द्वारा ऐसी फिल्में बनाना जो किसी वर्ग विषेष पर केंद्रित होतीे है. मल्टीप्लेक्स सिनेमा के इस दौर में फिल्मकार अब ऐसी फिल्मो को तरजीह देने लगे हैं, जो किसी वर्ग विषेष पर केंद्रित हो. नतीजा यह निकलता है कि ऐसी फिल्में उस वर्ग विषेष में तो कामयाब होेेे जाती है, लेकिन असल कामयाबी से वह दूर ही रहता है.
साल की शुरूआत में रिलीज हुई फरहान अख्तर अभिनीत कार्तिक काॅलिंग कालिंग की ही मिसाल लीजिए. फिल्म का गीत-संगीत उम्दा था, कहानी ताजा थी और फरहान अख्तर जैसा गंभीर अभिनेता भी था. बावजूद इसके अगर यह फिल्म नाकाम रही, तो इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि फिल्म की कहानी सिर्फ महानगर के युवाओं पर केद्रित थी. नतीजा यह रहा कि मल्टीप्लेक्स में तो फिल्म कुछ हद तक चली,, लेकिन छोटे शहरों, कस्बों और एकल सिनेमाघरों में फिल्म औंधे मूंह गिर गई. ऐसा ही कुछ हाल अभय देओल अभिनीत फिल्म रोड़ मूवी का भी हुआ. अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देषक देव बेनेगल के निर्देषन में बनी इस फिल्म ने दुनियाभर के फिल्म फेस्टिवल में खूब तारीफे और पुरस्कार बटौरे थे. लेकिन फिल्म जब देष के सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो कोई करिष्मा नहीं दिखा पाइ्र्र. वजह यह थी कि फिल्म केवल आर्ट फिल्मों के शौकीन दर्षकों को ध्यान में रखकर ही बनाई थी. नतीजा यह कि फिल्म ने फेस्टिवल में तो खूब पुरस्कार जीते, लेकिन जब दर्षकों के सामने आई, तो आर्ट फिल्मों के शौकीनों को छोड़कर किसी ने भी इसे पसंद नहीं किया. कुछ ऐसा ही राम गोपाल वर्मा की फूंक-2, अजय देवगन की फिल्म अतिथि तुम कब जाओगे, का भी हुआ. ये फिल्में देष के कुछ हिस्सों में तो कामयाब रही,, लेकिन अखिल भारतीय कामयाबी इनसे दूर ही रही.
दूसरी ओर हाउसफुल और राजनीति देष के सभी हिस्सों में अच्छा कारोबार करने में कामयाब हुई, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि इन दोनों ही फिल्मों की कहानी हर वर्ग के दर्षक के लिए थी-मल्टीप्लेक्स के दर्षकों के लिए भी,, ठाठिया सिनेमाघरों के दर्षकों के लिए भी. हास्य-मसाला फिल्में बनाने के लिए विख्यात साजिद खान की फिल्म हाउसफुल में काॅमेडी की भरपुर खुराक थी,, जिसके चलते यह 80 करोड़ से ज्यादा की कमाई करने में कामयाब रही. वही,, नाना पाटेकर, अजय देवगन, मनोज वाजपेयी और रणबीर कपूर जैसे सितारों से सजी राजनीति में महापुराण महाभारत को आधुनिक तरीके से प्रस्तुत किया गया था. चूंकि भ्रष्ट राजनीति से आजकल देष के हर हिस्से में जनता का पाला पड़ता है, इसलिए यह फिल्म हर किसी की जिंदगी के करीब थी. इसीलिए राजनीति जैसे गंभीर विषय पर आधारित होने के बाद भी फिल्म सौ करोड़ की कमाई करने के बेहद करीब है. असल में तो, आमिर खान की थ्री इडियट्स और गजनी के बाद यह भारतीय फिल्म इतिहास की तीसरी सबसे कामयाब फिल्म बन गई है.
बात बिल्कुल सीधी सी है, अगर फिल्मकारों को पूरे देष में कामयाबी हासिल करनी है, तो उनको ऐसी फिल्में बनाना होगी, जो हर दर्षक वर्ग को पसंद आए. अगर ऐसा हो जाए, तो हर साल दौ-तीन सौ करोड़ का घाटा उठाने वाला बाॅलीवुड फिर से मुनाफे की स्थिति में आ सकता है.

अधर में जूनियर बच्चन का कॅरिअर


किसी की दलील है कि अभिषेक बच्चन के लिए कामयाबी का सफर तय करना बेहद आसान सी लगने वाली बात हैं, क्योंकि आखिरकार वे बाॅलीवुड के सबसे बड़े सितारें अमिताभ बच्चन के पुत्र हैं. किसी दूसरे की दलील है कि अभिषेक की इंडस्ट्री में लंबी पारी खेलने की संभावना सौ फीसदी हैं, क्योंकि आखिरकार नाकाम फिल्मों के ढेर पर खड़े होने के बावजूद प्रत्येक निर्माता-निर्देशक उन्हें अपनी फिल्मों में लेने के लिए तैयार रहता है, क्योंकि उनके साथ बच्चन सरनेम जुड़ी हुई है. वहीं, कोई तीसरा यह दलील देता है कि अभिषेक के लिए टिकट खिड़की पर कामयाबी हासिल करना बेहद आसान है, क्योंकि आखिरकार उनकी ज्यादातर फिल्मों में पिता अमिताभ या पत्नी ऐश्वर्या राय अपनी सितारा हैसियत के साथ मौजूद होती है.
लेकिन अफसोस कि, बावजूद इन सभी दलीलों के अभिषेक बच्चन का कॅरिअर कुछ अलग ही तस्वीर बयां करता है. हाल ही में रिलीज हुई अभिषेक की एक और मेगा बजट फिल्म ‘रावण’ तमाम हो-हल्ले के बावजूद टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिर गई. फिल्म के साथ मणिरत्नम जैसे दिग्गज निर्देषक का नाम जुड़ा हुआ था, गुलजार और एआर रहमान की जुगलबंदी गीत-संगीत में जलवे बिखेरने के लिए मौजूद थी. और इन सबसे बड़कर ऐष्वर्या राय उनकी नायिका के तौर पर ग्लैमर का तड़का लगा रही थी. बावजूद इन सभी खूबियों के फिल्म टिकट खिडकी पर कोई कमाल नहीं दिखा पाई. अपनी इस महत्वाकांक्षी फिल्म को मणिरत्नम ने सौ करोड़ रुपए से ज्यादा के बजट में बनाया, दो भाषाओं में फिल्म को रिलीज किया. लेकिन अफसोस कि इसके बाद भी सौ करोड़ के बजट वाली यह फिल्म कूल जमा तीस करोड़ ही कमा पाई और साल की सबसे बड़ी नाकाम फिल्म के तौर पर दर्ज हो गई.
रावण के टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिरने के साथ ही अभिषेक के कॅरिअर को लेकर कयासों का दौर एक बार फिर शुरू हो गया. चर्चाएं होने लगी कि क्या रावण के साथ ही अभिषेक के कॅरिअर का भी अंत हो गया है ? भूलना नहीं चाहिए कि दिल्ली 6 और द्रोणा के बाद अभिषेक की यह लगातार तीसरी नाकाम फिल्म हैं. रावण की तरह ही दिल्ली 6 और द्रोणा भी बड़े बजट की फिल्मंे थी. साथ ही इन तीनों फिल्मों में अभिषेक एकल नायक की भूमिका में थे, मतलब यह कि पूरी फिल्म की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर ही थी. लेकिन अफसोस कि यह कंधे कमजोर साबित हुए, सो तीनों ही फिल्में टिकट खिड़की पर भरभरा कर गिर गई. सो, अब जूनियर बच्चन के कॅरिअर को खत्म मान लिया गया है.
वैसे भी बाॅलीवुड में हर साल नए, युवा सितारे दस्तक दे रहे हैं. शाहरूख, सलमान, आमिर जैसे सितारे उम्रदराज होते जा रहे हैं, तो उनकी जगह लेने के लिए शाहिद कपूर, रणबीर कपूर और इमरान खान जैसे नए सितारे कतार में हैं. ऐसे में पैंतीस साल के होने आए अभिषेक के लिए संभावनाएं कम ही बचती है. माना कि उनके साथ मणिरत्नम, गोल्डी बहल जैसे निर्माता-निर्देषक अपनी फिल्मों में लेते रहे हैं, लेकिन लगातार नाकामी के बाद अगर वे भी अभिषेक से मूंह मोड़ ले, तो आष्चर्य नहीं होना चाहिए. दूसरी ओर अन्य सितारों की तरह अभिषेक चैपड़ा, जौहर, भंसाली या विधु विनोद चैपड़ा कैंप के स्थायी सदस्य भी नहीं है. वहीं, उनकी पत्नी और भूतपूर्व सुंदरी ऐष्वर्या राय का कॅरिअर भी उतार पर है. प्रियंका, कैटरीना, सोनम कपूर और दीपिका जैसी नई हिरोईनों के आगमन ने ऐष्वर्या को पूरी तरह पाष्र्व में धकेल दिया है.
ऐसे में अभिषेक के लिए एक ही विकल्प बचता है-वे दोस्ताना फिल्म की तरह ही सहअभिनेता के तौर पर मल्टीस्टारर फिल्मों में काम करते रह सकते हैं. ऐसा करके शायद वे अपनी फिल्मी पारी को लंबा खींच सके. जहां तक एकल अभिनेता के तौर पर उनके भविष्य की बात है, तो वह तो लगातार तीन मेगा बजट फिल्मों की नाकामी के बाद खत्म हो गया ही लगता है.

Thursday, July 1, 2010

हेट नहीं, आई लव, लव स्टोरीज !



रोमांटिक फिल्मों के मामलें में बाॅलीवुड का रिकाॅर्ड रोजर फेडरर के खेल के माफिक ही उजला रहा है. चाहे वह साठ के दषक की राजकूपर-नरगिस अभिनीत आवारा हो या फिर नब्बे के दषक की हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे या फिर इक्कीसवीं सदी के पहले दषक की लव आजकल, जब वी मेट हों. रोमांस, नाच-गाना बाॅलीवुड की सबसे बड़ी पहचान है और प्रयोगवादी सिनेमा के वर्तमान दौर में भी ऐसी फिल्मों का बनना लगातार जारी है. सो, इसी माहौल में नए निर्देषक पुनीत मल्होत्रा इस शुक्रवार रोमांटिक फिल्मों के शौकीन दर्षकों के लिए आई हेट लव स्टोरीज लेकर हाजिर हैं. करण जौहर के कैंम्प की इस फिल्म को उनतीस साल के पुनीत ने वैसी ही फिल्म में ढाला है, जैसे कि उनके गुरू करण ने दिलवालिया दुलहनियां ले जाएंगे में ढाला था. छोटी सी कहानी,, प्यार के पीछे भागते किरदार और एक-दूसरे को लेकर बदलते नायक-नायिका के अहसास, आई हेट लव स्टोरीज में सबकुछ हैं. फिल्म की कहानी इमरान खान के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बाॅलीवुड में एक फिल्म निर्देषक के साथ असिस्टेंट के तौर पर जुड़ा है. पेंच यहां पर यह है कि उसका बाॅस रोमांटिक फिल्मों का सबसे बड़ा निर्देषक है, लेकिन इमरान तो ‘यूज एंड थ्रो’ की पाॅलिसी वाला बंदा है. लेकिन उसकी जिंदगी तब बदल जाती है, जब सोनम कपूर उसके बाॅस की फिल्म में प्रोडक्षन डिजाइनर के तौर पर जुड़ती है. सोनम कपूर की जिंदगी में प्यार ही सबकुछ है, जबकि बंदे इमरान का इससे कोई वास्ता नहीं.. ऊपर से तुक्का यह कि सोनम कपूर पहले ही किसी के साथ प्यार में डूबी हुई है. सो, आगे इमरान भी प्यार के मायने समझता है और प्यार करने लग जाता है अपनी उसी से, जिसने उसे प्यार के मायने समझाए, मतलब सोनम कपूर से....बस, आगे की कहानी में वहीं सबकुछ है, जो आप देखना चाहते हैं.....प्यार, मनाना.
अब बात, फिल्म के कलाकारों की. इमरान खान ने ऐसा ही रोल अपनी पहली फिल्म जाने तू या जाने में भी किया था, लेकिन इस बार कुछ ज्यादा निखार आ गया है, उनकी एक्टिंग में. लेकिन फिल्म की यूएसपी है सोनम कपूर. पहली फिल्म सांवरियां और दिल्ली 6 में तो अनिल कपूर की यह लाडली बिटिया मुरझाई सी लगी थी.. लगा था एक-दो फिल्मों के बाद घर न बैठ जाएं. लेकिन अपनी तीसरी फिल्म में सोनम ने वो अदाकारी दिखाई है कि इंडस्ट्री की टॅाप हिरोईनों की तो रातों की नींद उड़ी समझो. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है पुनीत मल्होत्रा ने बतौर निर्देषक अपनी पहली ही फिल्म में. निर्देषन शानदार किया है, हां फिल्म की कहानी लिखने की कला उनकों और ज्यादा तराषनी होगी. फिर भी,, पहली फिल्म के लिहाज से तो अभी उनकी तारीफ होनी चाहिए.
कूल जमा, यह फिल्म प्यार करने वालों के लिए हैं, युवाओं के लिए हैं. अगर आप युवा हैं, या फिर आपका दिल जवान हैं और आप प्यार में यकीन रखते हैं, तो फिर चले जाइए अपने नजदीकी सिनेमाघर की ओर-जहां आई हेट लव स्टोरीज चल रही हो.....यकीनन आप यह कहते हुए बाहर निकलेंगे-आई लव लव स्टोरीज...

बजट की मारी, फिल्में बेचारी



सोनम कपूर फिल्म इंडस्ट्री में भले हीे दो फिल्म पुरानी हो, लेकिन हाल ही में उन्होंने बड़े पते की बात कह डाली. अपनी नई फिल्म आई हेट लव स्टोरीज की रिलीज से ठीक पहले सोनम ने एक समझदारीभरा बयान दिया-बाॅलीवुड में फिल्में असफल नहीं होती, उनका बजट असफल होता है. बात सोनम की सौ टका सही है, सो इसे जरा सरल भाषा में समझने की कोषिष करते हैं.
दरअसल, सोनम कपूर के कहने का मतलब यह है कि बाॅलीवुड में कई फिल्में अपने बजट की वजह से नाकाम हो जाती है. बात सही भी है, बाॅलीवुड में हर साल आधा दर्जन से भी ज्यादा ऐसी फिल्में रिलीज होती है, जो बेहतरीन होने के बावजूद आखिर में असफल फिल्मों के खाते में जोड़ दी जाती है, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका बजट बहुत ज्यादा था. इसे हाल ही में रिलीज हुई फिल्म काइट्स के जरिए समझा जा सकता है. स्पेनिष और हिंदी को मिलाकर कूल जमा दो भाषाओं में रिलीज हुई रितिक रोषन की इस फिल्म का कूल बजट सौ करोड़ रूपए से भी ज्यादा था. पहली बात तो यह कि फिल्म में रितिक की हिरोईन के तौर पर हाॅलीवुड से आयातित बारबरा मूरी को करोड़ों रूपए देकर साईन किया गया, इसके बाद पिछले दषक के सर्वश्रेष्ठ निर्देषक करार दिए गए राकेष रोषन ने निर्माता होते हुए भी फिल्म के निर्देषन की जिम्मेदारी अनुराग कष्यप को सौंपी. चूंकि अनुराग कष्यप इंडस्ट्री के ए-लिस्ट निर्देषकांे में गिने जाते हैं, सो उन्होंने भी रोषन से खासी फीस वसूली. फिल्म की शूटिंग में भी रोषन ने करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए. दक्षिण अफ्रीका की खूबसूरत लोकेषनों पर शूटिंग की गई और मारधाड़ के दृश्यों को हाॅलीवुड टच देने के लिए भी करोड़ों रूपए खर्च कर दिए गए.
सो, फिल्म रिलीज हुई सौ करोड़ रुपए से ज्यादा के बजट के साथ. चूंकि फिल्म में रितिक रोषन जैसा बड़ा सितारा था, सो दर्षकों ने रिलीज के साथ ही इसे हाथों-हाथ लिया. फिल्म की कहानी अच्छी नहीं थी, आलोचकों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया था, बावजूद इसके रितिक के प्रषंसक फिल्म देखने के लिए सिनेमाघरों की ओर दौड़े चले आए. प्रषंसकों के रितिक को लेकर प्यार के चलते ही पहले सप्ताह मंें फिल्म ने पैंतीस करोड़ रूपए के आसपास कमाई भी कर ली और पंद्रह दिनों के बाद फिल्म पचास करोड़ रूपए कमाने में भी कामयाब रही.
बावजूद इसके, नतीजा सिफर ही रहा. वजह, फिल्म का बजट सौ करोड़ रूपए से भी ज्यादा का था. सो पचास करोड़ रूपए कमाने के बाद भी काइट्स आने वाले सालों में एक असफल फिल्म के तौर पर जानी जाएगी, क्योंकि वह अपनी लागत निकालने में कामयाब नहीं हो पाई.
सो, सोेनम कपूर के कहने का मतलब यही है कि बाॅलीवुड में बड़े बजट की ज्यादातर फिल्में करोड़ों की कमाई करने के बावजूद आखिर में नाकाम फिल्म के तौर पर दर्ज हो जाती है, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उन फिल्मों का बजट उनकी कूलजमा कमाई से कहीं ज्यादा था. पिछले दो सालों की ही बात करें, तो अक्षय कुमार अभिनीत ब्ल्यू-बजट अस्सी करोड़, कमाई तीस करोड़़, सैफ अली खान अभिनीत कुर्बान-बजट पचास करोड़, कमाई अट्ठाइस करोड़, शाहिद कपूर की कमीने-बजट चालीस करोड़, कमाई पच्चीस करोड़, और अक्षय कुमार की चांदनी चैक टू चाइना-बजट अस्सी करोड़ से ज्यादा, कमाई तीस करोड़ के आसपास-ऐसी फिल्में है, जो अगर कम बजट में बनाई जाती, तो कामयाब कहलाती. लेकिन चूंकि इन फिल्मों का बजट ज्यादा था, टिकट खिड़की पर ठीकठाक कमाई करने के बाद भी ये फिल्में असफल के तौर पर याद की जाती हैं.
मतलब बिल्कुल साफ है, बजट कम करों, सितारों को जायज पैसा दो और फिल्म का टिकट खिड़की पर हिट होने की संभावना बढ़ा दो. बाॅलीवुड को इस फाॅर्मूलें पर तल्काल गौर करने की जरूरत है.

बड़े सितारे नही,ं अच्छी कहानी चाहिए...



दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग के तौर पर विख्यात बाॅलीवुड इन दिनों खस्ताहाल है. पिछले तीन सालों से एक के बाद एक बड़़े बजट की फिल्मों की टिकट खिड़की पर नाकामी ने मुनाफे को रसातल में पहुंचा दिया हेे. एक अनुमान के मुताबिक पिछले तीन सालांें में बजट की फिल्मांे की नाकामी के चलते बाॅलीवुड को सात सौ करोड़ रूपए से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है. 2010 में तो हालात और भी ज्यादा खराब नजर आ रहे ह. काइट्स, रावण जैसी बड़े बजट की फिल्मांे के टिकट खिड़की पर धराषायी होने से बाॅलीवुड को इन दोनो फिल्मों से ही 150 करोड़ से ज्यादां का नुकसान झेलना पडं़ां हे.
ंबाॅलीवुड के ंिलए इन फिल्मांे की नाकामी से भी बड़ा सदमा है, इन फिल्मों से जुड़े बड़े सितारो की नाकामी. अगर शाहरूख, सलमान, आमिर खान, सैंेफ अली खान, अक्षय कुमार, रितिक राषन और शाहिद कपूर को इंडस्ट्री के शीर्ष आधा दर्जन अभिनेताओं की श्रेणी में शुमार किया जाए, तो पिछले दो सालों में इन सितारों की फिल्मों के टिकट खिड़की पर प्रदर्षन को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है, कि आखिर क्यों नब्बे के दषक में मुनाफें की ओर देखने वाला बाॅलीवुड एक बार फिर घाटे के दौर से गुजर रहा है. पिछले दो साल में शाहरूख खान की बिल्लु बार्बर और दूल्हा मिल गया जैसी फिल्में टिकट खिड़की पर औंधे मूंह गिरी है. वहीं, सलमान खान की मैं और मिससे खन्ना, नमस्ते लंदन जैसी फिल्में कोई करिष्मा नहीं दिखा पाई. सैफ अली खान के खाते में भी पिछले दो साल में कुर्बान जैसी नाकाम फिल्म दर्ज है. वहीं अक्षय कुमार ने पिछले दो साल में चांदनी चैक टू चाइना, दे दना दन, ब्ल्यू जैसी नाकाम फिल्में दी है, तो शाहिद कपूर के खाते में भी चांस पे डांस, पाठषाला जैसी असफल फिल्में आई है. वहीं दो साल में एक फिल्म करने की रणनीति पर चलने वाले रितिक रोषन की बहुप्रतिक्षित काइट्स भी इसके निर्माताओं के लिए कटी पतंग ही साबित हुई.
ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बड़े सितारों की करिष्माई छवि के बावजूद आखिरकार ये फिल्में नाकाम क्यों हुई.? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाॅलीवुड में इन सितारों को लेकर किस तरह का आकर्षण है. बाॅलीवुड में निर्माता, निर्देशक, लेखक, अभिनेत्रियां सभी इन सितारों के साथ काम करने के लिए कतार में खड़े रहते हैं.ये सभी सितारें एक फिल्म के लिए आमतौर पर पांच करोड़ रूपए से भी ज्यादा की फीस वसूलते हैं.
बावजूद इसके अगर इन सितारों की फिल्में टिकट खिड़की पर लगातार नाकाम साबित हो रही है, तो इसके पीछे ऐसी कई वजहें हैं, जिन्हें समझने के लिए निर्माता-निर्देषक तैयार नहीं है. बड़े सितारों की फिल्मों की नाकामी की सबसे बड़ी वजह तो सिनेमाघरों में टिकटों की बढ़ती कीमत है. सीधा सा गणित है, मल्टीप्लेक्स संस्कृति के आगमन के बाद पिछले चंद सालों में टिकटों की कीमत में दो से तीन गुणा तक की बढ़ोतरी हुई है. .चंद सालों पहले तक चालीस-पचास रूपए में मिलने वाले टिकट अब डेढ़, दो सौ रूपए तक पहुंच गई है. सो, वे दर्षक जो पहले सस्ते टिकटों के दौर में अपने पसंदीदा सितारें की औसत फिल्मों को देखने भी पहुंच जाया करते थे, अब इन घटिया फिल्मों से दूर ही रहने लगे हैं. आज के दौर में परिवार सहित एक मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने जाने पर अमूमन हजार रूपए से ज्यादा ही खर्च आता है, जो कि इस महंगाई के दौर में आम आदमी के लिए संभव नहीं है. दूसरी वजह यह है कि निर्माता, निर्देषक इन बड़े सितारों को साईन करने के बाद फिल्म की कहानी, संगीत और अन्य दूसरी चीजों को बिल्कुल ही नजरअंदाज कर देते हैं. नतीजा यह होता है कि ऐसी फिल्मों में सितारों का लुक, डाॅयलागबाजी, मारधाड़, रोमांस, नाच-गाना तो खूब होता है, लेकिन कहानी दूर-दूर तक नजर नहीं आती. सो, दर्षक अपने पसंदीदा सितारे की फिल्म देखने एक बार तो हिम्मत करके पहुंच भी जाते हैं, लेकिन उसके बाद उस फिल्म को देखने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता. पिछले दो साल में बड़े सितारों और बड़े बजट की लगभग सभी फिल्मों का यही अंजाम हुआ है. चांदनी चैक टू चाइना, ब्ल्यू, काइट्स इन सभी फिल्मों ने टिकट खिड़की पर पहले तीन दिन तो खूब कमाई की, लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरते गए, इन फिल्मों की घटिया कहानी के चलते दर्षक भी दूर होते गए.
मतलब बिल्कुल साफ है, बाॅलीवुड को अपनी रणनीति में तत्काल बदलाव करने की सख्त जरूरत है. निर्माता-निर्देषकों को करोड़ो रूपए वसूलने वाले सितारों के पीछे भागने के बजाए अपनी फिल्म की कहानी पर जोर देना होगा. कहानी अच्छी होगी, तो गुमनाम अभिनेताओं वाली फिल्में भी चल जाएगी, जैसा कि बीतें सालों में आमिर, ए वेडनसडे, खोसला का घोंसला जैसी फिल्मों ने साबित भी किया है. सो, बाॅलीवुड के लिए यह सितारों की चकाचैंध से बाहर आने का वक्त है.
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